jab KHvaab kabhi tere mere saath chalen hain | जब ख़्वाब कभी तेरे, मेरे साथ चलें हैं

  - Khalid Azad

जब ख़्वाब कभी तेरे, मेरे साथ चलें हैं
फिर तेज़ बहुत वक़्त से लम्हात चलें हैं

कब, कैसे, कहाँ तुम सेे बिछड़ जाएँगे इक दिन
हर वक़्त मेरे साथ ये ख़दशात चलें हैं

मंज़िल पे पहुँचने की थी कुछ ऐसी ही चाहत
थक हार के भी राह में दिन रात चलें हैं

तन्हाई में होकर भी मैं तन्हा नहीं रहता
कुछ ग़म तेरे हर वक़्त मेरे साथ चलें हैं

अब ज़हर पिए कौन ये सच्चाई के ख़ातिर
इस रह पे कहाँ अब कोई सुक़रात चलें हैं

चलना है तुम्हें ख़ुद ही अब इस एक सफ़र पर
कब लोग हर इक वक़्त यहाँ साथ चलें हैं

  - Khalid Azad

Raasta Shayari

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