jaanta hoon ki tujhe saath to rakhte hain kai | जानता हूँ कि तुझे साथ तो रखते हैं कई

  - Umair Najmi

जानता हूँ कि तुझे साथ तो रखते हैं कई
पूछना था कि तेरा ध्यान भी रखता है कोई?

  - Umair Najmi

Yaad Shayari

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    तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी कामयाब न हो सकीं
    तिरी याद शाख़-ए-गुलाब है जो हवा चली तो लचक गई
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More by Umair Najmi

As you were reading Shayari by Umair Najmi

    बड़े तहम्मुल से रफ़्ता रफ़्ता निकालना है
    बचा है जो तुझ में मेरा हिस्सा निकालना है

    ये रूह बरसों से दफ़्न है तुम मदद करोगे
    बदन के मलबे से इस को ज़िंदा निकालना है

    नज़र में रखना कहीं कोई ग़म-शनास गाहक
    मुझे सुख़न बेचना है ख़र्चा निकालना है

    निकाल लाया हूँ एक पिंजरे से इक परिंदा
    अब इस परिंदे के दिल से पिंजरा निकालना है

    ये तीस बरसों से कुछ बरस पीछे चल रही है
    मुझे घड़ी का ख़राब पुर्ज़ा निकालना है

    ख़याल है ख़ानदान को इत्तिलाअ दे दूँ
    जो कट गया उस शजर का शजरा निकालना है

    मैं एक किरदार से बड़ा तंग हूँ क़लमकार
    मुझे कहानी में डाल ग़ुस्सा निकालना है
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    Umair Najmi
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    कुछ सफ़ीने हैं जो ग़र्क़ाब इकट्ठे होंगे
    आँख में ख़्वाब तह-ए-आब इकट्ठे होंगे

    जिन के दिल जोड़ते ये उम्र बिता दी मैं ने
    जब मरूँगा तो ये अहबाब इकट्ठे होंगे

    मुंतशिर कर के ज़मानों को खंगाला जाए
    तब कहीं जा के मिरे ख़्वाब इकट्ठे होंगे

    एक ही इश्क़ में दोनों का जुनूँ ज़म होगा
    प्यास यकसाँ है तो सैराब इकट्ठे होंगे

    मुझ को रफ़्तार चमक तुझ को घटानी होगी
    वर्ना कैसे ज़र-ओ-सीमाब इकट्ठे होंगे

    उस की तह से कभी दरयाफ़्त किया जाऊँगा मैं
    जिस समुंदर में ये सैलाब इकट्ठे होंगे
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    Umair Najmi
    मिरी भँवों के ऐन दरमियान बन गया
    जबीं पे इंतिज़ार का निशान बन गया

    सुना हुआ था हिज्र मुस्तक़िल तनाव है
    वही हुआ मिरा बदन कमान बन गया

    मुहीब चुप में आहटों का वाहिमा हवा
    मैं सर से पाँव तक तमाम कान बन गया

    हवा से रौशनी से राब्ता नहीं रहा
    जिधर थीं खिड़कियाँ उधर मकान बन गया

    शुरूअ' दिन से घर मैं सुन रहा था इस लिए
    सुकूत मेरी मादरी ज़बान बन गया

    और एक दिन खिंची हुई लकीर मिट गई
    गुमाँ यक़ीं बना यक़ीं गुमान बन गया

    कई ख़फ़ीफ़ ग़म मिले मलाल बन गए
    ज़रा ज़रा सी कतरनों से थान बन गया

    मिरे बड़ों ने आदतन चुना था एक दश्त
    वो बस गया 'रहीम' यार-ख़ान बन गया
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    Umair Najmi
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    यार तस्वीर में तन्हा हूँ मगर लोग मिले
    कई तस्वीर से पहले कई तस्वीर के बा'द
    Umair Najmi
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    नहीं लगेगा उसे देख कर मगर ख़ुश है
    मैं ख़ुश नहीं हूँ मगर देख कर लगेगा नहीं
    Umair Najmi
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