mere tohfon ne mohabbat ka bharam tod diya | मेरे तोहफ़ों ने मोहब्बत का भरम तोड़ दिया

  - Ahmad Abdullah

मेरे तोहफ़ों ने मोहब्बत का भरम तोड़ दिया
चूड़ियाँ तंग निकल आई हैं और हार खुले

  - Ahmad Abdullah

Haar Shayari

Our suggestion based on your choice

    एक दिन दोनों ने अपनी हार मानी एक साथ
    एक दिन जिस से झगड़ते थे उसी के हो गए
    Nomaan Shauque
    29 Likes
    हर दिन ही मोहब्बत को पाने की लड़ाई में
    जो हार नहीं सकता वो जीत नहीं सकता
    Hasan Raqim
    अगर तू ख़ुश है मेरी हार से तो
    मेरी हर जीत से नफ़रत है मुझको
    Shadab Javed
    26 Likes
    'नबील' इस इश्क़ में तुम जीत भी जाओ तो क्या होगा
    ये ऐसी जीत है पहलू में जिस के हार चलती है
    Aziz Nabeel
    18 Likes
    अपना सब कुछ हार के लौट आए हो न मेरे पास
    मैं तुम्हें कहता भी रहता था कि दुनिया तेज़ है
    Tehzeeb Hafi
    107 Likes
    हम भी क्या ज़िंदगी गुज़ार गए
    दिल की बाज़ी लगा के हार गए
    Dagh Dehlvi
    53 Likes
    हम हार गए तुम जीत गए हम ने खोया तुम ने पाया
    इन छोटी छोटी बातों का हम कोई ख़याल नहीं करते
    Wali Aasi
    40 Likes
    दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के
    वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के
    Faiz Ahmad Faiz
    43 Likes
    हार हो जाती है जब मान लिया जाता है
    जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है
    Shakeel Azmi
    174 Likes
    वाक़िफ़ कहाँ ज़माना हमारी उड़ान से
    वो और थे जो हार गए आसमान से
    Faheem Jogapuri
    83 Likes

More by Ahmad Abdullah

As you were reading Shayari by Ahmad Abdullah

    ज़िंदगी बेशुमार रस्ते हैं
    ख़ुद को मुझसे गुज़ार रस्ते हैं

    एक रस्ता है सिर्फ़ मस्जिद को
    मयकदे को हज़ार रस्ते हैं

    काफ़िला मर रहा है सुनने को
    बोल दे शह-सवार रस्ते हैं

    इश्क़ ने ही कहा था मूसा को
    हो जा दरिया के पार रस्ते हैं

    इस इलाके में एक शायर है
    इसलिए सोगवार रस्ते हैं
    Read Full
    Ahmad Abdullah
    22 Likes
    पता करो कि मेरे साथ कौन उतरा था
    ज़मीं पे कोई अकेला नहीं उतरता है
    Ahmad Abdullah
    50 Likes
    तनक़ीद न तक़रार बड़ी देर से चुप हैं
    हैरत है मेरे यार बड़ी देर से चुप हैं

    गूँगों को तकल्लुक़ के मवाक़े हैं मयस्सर
    हम माहिर-ए-गुफ़्तार बड़ी देर से चुप हैं
    Read Full
    Ahmad Abdullah
    32 Likes
    जा-ब-जा तीरगी हर घड़ी तीरगी
    अब मेरे चार सू आ बसी तीरगी

    चार चीज़ों पे मबनी है कमरा मेरा
    चंद यादें धुआँ इक घड़ी तीरगी

    तेरे आने से इतना चरागाँ हुआ
    वरना मेरे लिए ज़िन्दगी तीरगी

    रूप कैसे मैं लूँ धार तेरा बता
    मिल है पाई कभी रौशनी तीरगी

    रात गहरी में छुप जाता है माह भी
    हुस्न छीनेगी तेरा मेरी तीरगी

    कोई अल्लाह का बन्दा बताए मुझे
    आईने में हूँ मैं या खड़ी तीरगी

    हाथ मैंने मिलाया चराग़ों से जब
    देख के ये सितम रो पड़ी तीरगी

    इनकी निस्बत से ही तो मैं ज़िन्दा रहा
    आशिक़ी दिलबरी शायरी तीरगी
    Read Full
    Ahmad Abdullah
    10 Likes
    इस सोच का क़ब्ज़ा मेरे इदराक पे होना
    अफ़लाक पे होने के लिए ख़ाक पे होना

    दुनिया मुझे पूछे कि ये ख़ुशबू है किधर की
    और मेरा ख़याल आपकी पोशाक पे होना
    Read Full
    Ahmad Abdullah
    29 Likes

Similar Writers

our suggestion based on Ahmad Abdullah

Similar Moods

As you were reading Haar Shayari Shayari