थक चुका हूँ देख कर मैं वक़्त की रफ़्तार को
हर जगह पे हर दफ़ा तो कुछ नए किरदार को
जब तलक ख़ामोश मैं था बोलते ही वो रहे
चुप हुए हैं अब मेरी वो देख कर गुफ़्तार को
साथ तेरे 'इश्क़ का भी मैं कभी करता सफ़र
पर हमें चलना पड़ा है देख कर घर-बार को
ख़ाक शायद दश्त की छानी है उसने 'उम्र भर
घर समझ बैठा फक़त वो देख कर दीवार को
बात हक़ की आज तक करते रहें हैं हर जगह
लफ्ज़ हम बदले नहीं हैं देख कर दरबार को
फ़ैसला मैदान का मंजूर है हर हाल में
हम कहाँ डरते कभी हैं देख कर सालार को
अब ग़ज़ल में दर्द की तासीर ख़ालिद कम करो
सब के सब तो रो रहे सुन के अब अश’आर को
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