thak chuka hooñ dekh kar main waqt ki raftaar ko | थक चुका हूँ देख कर मैं वक़्त की रफ़्तार को

  - Khalid Azad

थक चुका हूँ देख कर मैं वक़्त की रफ़्तार को
हर जगह पे हर दफ़ा तो कुछ नए किरदार को

जब तलक ख़ामोश मैं था बोलते ही वो रहे
चुप हुए हैं अब मेरी वो देख कर गुफ़्तार को

साथ तेरे 'इश्क़ का भी मैं कभी करता सफ़र
पर हमें चलना पड़ा है देख कर घर-बार को

ख़ाक शायद दश्त की छानी है उसने 'उम्र भर
घर समझ बैठा फक़त वो देख कर दीवार को

बात हक़ की आज तक करते रहें हैं हर जगह
लफ्ज़ हम बदले नहीं हैं देख कर दरबार को

फ़ैसला मैदान का मंजूर है हर हाल में
हम कहाँ डरते कभी हैं देख कर सालार को

अब ग़ज़ल में दर्द की तासीर ख़ालिद कम करो
सब के सब तो रो रहे सुन के अब अश’आर को

  - Khalid Azad

Ishq Shayari

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