प्यार से है नफ़रत तो अब सुकून है दिल को
थी नहीं हमारी है अब तलाश मंज़िल को
दिल निकाल सीने से सौंप देना मालिक को
मेरी आख़िरी इच्छा तुम बता दो क़ातिल को
मेरे दिल का इक कोना उस में है अँधेरा बस
सब का दिल लगे मुझ से सब से डर लगे दिल को
तू नहीं ये समझेगी घर का मैं बड़ा लड़का
छोड़ मेरी बातों को क्यूँ बढ़ाना मुश्किल को
घाट घाट पानी पी हम तो अब भी प्यासे हैं
ख़ुद थे भटके हम साहिब पथ दिखाया मंज़िल को
थोड़ा नीचे गर्दन से शर्ट में छुपा उस की
बुझ गई थीं दो आँखें इतना देखा इक तिल को
— Anuj Vats















