रंज दिल में ज़रा भी नहीं
मैं हूँ ज़िंदा मरा भी नहीं
दर्द मेरा किसी को दिखे
ज़ख़्म इतना हरा भी नहीं
ज़िंदगी से परेशान था
मौत से वो डरा भी नहीं
चाहिए उस को लड़की वही
वरना फिर अप्सरा भी नहीं
दे दिए ज़िंदगी भर के ग़म
रहम आया ज़रा भी नहीं
कैसे ग़म समझे मेरा कोई
ग़म का तो दायरा भी नहीं
जब मोहब्बत गई छोड़ के
मैं तो साला मरा भी नहीं
जितना वो पाक-दिल है 'अनुज'
उतना सोना खरा भी नहीं
— Anuj Vats















