nakul Kumar

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@nakulkumar

nakul Kumar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in nakul Kumar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Ghazal
लड़खड़ाती है क़लम रंगीनियाँ ही क्यों लिखूँ
लू से जलता है बदन पुर्वाइयाँ ही क्यों लिखूँ

दिख रही हों जब मुझे हैवानियत की बस्तियाँ
तो इन्हें महबूब की शैतानियाँ ही क्यों लिखूँ

देख लूँ मैं जब कभी बूढ़ी भिखारन को कहीं
क्यों लिखूँ ग़ज़लों में परियाँ रानियाँ ही क्यों लिखूँ

फूल से बच्चों के चेहरे भूख से बेरंग हों
तो बता ऐ दिल मिरे फिर तितलियाँ ही क्यों लिखूँ

माँ तिरे चेहरे पे जब से झुर्रियाँ दिखने लगीं
और भी लिखना है कुछ रानाइयाँ ही क्यों लिखूँ

क्यों लिखूँ ज़ुल्फ़-ओ-लब-ओ-रुख़सार पे नग्मे बहुत
प्यार की पहली नज़र रुस्वाइयाँ ही क्यों लिखूँ

लिख तो सकता हूँ बहुत सी ख़ुशनुमा ऊँचाइयाँ
फिर ग़मों की ही बहुत गहराइयाँ ही क्यों लिखूँ

क्यों लिखूँ दोनों तरफ़ दोनों तरफ़ की क्यों लिखूँ
रौशनी लिख दूँ मगर परछाइयाँ ही क्यों लिखूँ

जंग के मैदान में ये ख़ून या सिन्दूर है
शोर जब भरपूर है शहनाइयाँ ही क्यों लिखूँ

पेट की ख़ातिर जो हरदम तोड़ता हो तन बदन
चैन से बैठा नहीं अँगड़ाइयाँ ही क्यों लिखूँ

मैं लिखूँ दुनिया के हर इक आदमी की ज़िंदगी
मौत की आमद या फिर बीमारियाँ ही क्यों लिखूँ

ये नए लड़के जो सोलह साल के ही हैं अभी
इनकी ये मदमस्तियाँ-नादानियाँ ही क्यों लिखूँ

ज़िंदगी अपनी अभी तो ज़िंदगी से है जुदा
अब मगर वीरानियाँ-बर्बादियाँ ही क्यों लिखूँ

हाँ मिरे बेटे लिखूँगा मैं तुझे मेले बहुत
मैं अकेला ही जिया तन्हाइयाँ ही क्यों लिखूँ
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nakul Kumar
क्या कहूँ कैसे कहूँ बेहाल हूँ इस हाल में
बेसुधी में गुम हूँ तेरी यादों के जंजाल में

लोग सुन कर वाह-वाही करते हैं हर बार ही
रोज़ ही रोता हूँ अब तो मैं किसी सुर-ताल में

तेरे दिल में घर किया तो ये लगा मुझको अभी
मेरा तो घर हो गया है काल के ही गाल में

खींच ली है खाल सब ख़ुशियों के ही बिकवाल ने
कौन ढूँढ़ेगा मुझे मेरे ही इस कंकाल में

तू नहीं आया कि अब है साल आने को नया
फिर अधूरा रह गया हूँ इस गुज़रते साल में

लौट आया हूँ समंदर से इसी उम्मीद में
कोई तो मछली मिले ठहरे हुए इस ताल में

जा रही हो छोड़कर मुझको जहाँ आऊँगा मैं
चाहती है इक हसीं मुझको तिरे ससुराल में

क्या करूँ क्या दर्द अपने बाँट लूँ दुनिया से मैं
घोल दूँगा अपने सारे अश्क इस पाताल में

मुझको पूरा खा गया है दिल के दरवाज़े तलक
भेड़िया फिर मिल गया है भेड़ की ही खाल में
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nakul Kumar