कुछ देखता भी है नहीं बाग़-ए-बहार मेंजो हारता है ज़िन्दगी हर बार प्यार मेंकह कर गई है कपड़े सुखा दूँ तो बात होदिन हो गए है सात मैं हूँ इंतिज़ार में— nakul kumar