
तन्हा रहता हूँ अक्सर ही हर एक का फिर हो जाता हूँ
हो जाता हूँ जैसे दुनिया फिर ख़ुद में ही खो जाता हूँ
चुप-चाप पड़ा हूँ कोने में ग़म दर्द जुदाई साथ लिए
जब नींद कभी आ जाए तो ख़्वाबों को बिछा सो जाता हूँ
— nakul kumar
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