इश्क़ की बातों में जो आ बैठा
उस को अपना ख़ुदा बना बैठा
मेरा किरदार ही रहा ऐसा
हँसते चेहरों को मैं रुला बैठा
कर के साज़िश मेरी तबाही की
रोने वालों की सफ़ में जा बैठा
क़त्ल होना है लाज़िमी उस का
मजहब -ए- इश्क़ जो बना बैठा
चाँद रातों का उस की क्या डूबा
मेरा दीपक तलक बुझा बैठा।
थी नसीहत मेरे बुजुर्गों की
दुश्मनों को गले लगा बैठा
ज़िन्दगी थी लिखी जहाँ उस की
जान अपनी वहीं गँवा बैठा
— Ram Singar Malak















