उसी ने जंग में मुझ को शिकस्तगी दी थी
कि जिस को हम ने ज़माने की हर ख़ुशी दी थी
हुई जो सुब्ह तो सारे लगे बुझाने में
चराग़ जिस ने सभी को ही रौशनी दी थी
नसीब देखिए वो जा गिरा समुंदर में
वो एक दरिया मुझे जिस ने तिश्नगी दी थी
वो एक सोची हुई साज़िशों से क़त्ल हुआ
सबूत माँगा तो फिर वज्ह ख़ुद-कुशी दी थी
इसे मैं प्यार न समझूँ तो और क्या समझूँ
लगा जो घाव तो फिर उस ने ओढ़नी दी थी
ये कैसे कह दूँ मुझे कुछ नहीं मिला उस से
उसी के ग़म ने ही मुझ को सुखनवरी दी थी
तमाम रात 'मलक' गुफ़्तगू मैं करता था
कि उस ने फ़ोटो मुझे ऐसी बोलती दी थी
— Ram Singar Malak















