उजला हो बदन ज़ेहन के काले नहीं देखे
पहले तो कभी ऐसे ज़माने नहीं देखे
शोहरत पे मेरे रश्क किया करते हैं वो लोग
जिस ने भी मेरे राह के काँटे नहीं देखे
मुद्दत हुई है उन से बिछड़ के मुझे लेकिन
यादों के मकाँ में कभी जाले नहीं देखे
पड़ते ही नहीं कम कभी अश्कों के ये गौहर
ऐसे तो कभी हम ने ख़ज़ाने नहीं दिखे
ओझल हुआ जिस दिन से वो नूरानी सा चेहरा
उस दिन से कभी हम ने उजाले नहीं देखे
ग़फ़लत में कटी मेरी जवानी तेरे दर पे
खुलते हुए इक रोज़ भी ताले नहीं देखे
सौ बार फिसल जाएँगे सौ बार उठेंगे
तुम ने मेरे मज़बूत इरादे नहीं देखे
हर याद पे ताज़ा हुए हैं ज़ख़्म "मलक" के
मुद्दत से कोई घाव पुराने नहीं दिखे















