देखता मैं रोज़ सर तन से जुदा होते हुए
    हाथ में तलवार पकड़े हैं ख़ुदा होते हुए
    Subodh Sharma "Subh"
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    तुम हो ज़ोया इश्क़ मेरा इस बनारस की तरह
    पर मैं कुंदन तो नहीं हूँ जो कलाई काट लूँ
    Subodh Sharma "Subh"
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    आता है काम कब ये सिखाया हुआ सबक़
    सब सीख के भी हाथ पे छाले पड़े रहे
    Subodh Sharma "Subh"
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    चल दिया पलट के मैं घर ख़ुमार बाक़ी है
    कुछ सुधार है मुझमें कुछ सुधार बाक़ी है

    साथ जो मेरे था, मैं क़र्ज़-दार सबका हूँ
    शुक्र है ख़ुदा मुझपे इक उधार बाक़ी है
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    Subodh Sharma "Subh"
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    हर सम्त है ख़ुदा वो किसी से जुदा नहीं
    गालिब नज़र से पी है नज़र में ख़ुदा नहीं
    Subodh Sharma "Subh"
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    हाथ सर पे रख रहे गुस्ताख़ ख़ाली
    जल गया जब सब बची है राख़ ख़ाली

    इन ठिकानों पर भला अब कौन चहके
    सब परिंदे उड़ गए हैं शाख़ ख़ाली
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    Subodh Sharma "Subh"
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    आदमी को आदमी खलता रहेगा
    उम्र-भर ये सिलसिला चलता रहेगा

    रौशनी का काम सब अंधे करेंगे
    हाथ पर सबके दिया जलता रहेगा

    वो मिलेगा एक दिन इस राह पे तू
    यार कब-तक इस तरह चलता रहेगा

    लोग जो कहते नहीं हैं दुख किसी से
    शायरी में वो सदा ढलता रहेगा
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    Subodh Sharma "Subh"
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    लोग जो कहते नहीं है दुख किसी से
    शायरी में वो सदा ढलता रहेगा
    Subodh Sharma "Subh"
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    वो जिसे जाना नहीं था जा चुका है
    कारवाँ से क्या मुझे चलता रहेगा
    Subodh Sharma "Subh"
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    हाँ नहीं तक़दीर में तो क्या हुआ है
    पर हमेशा दिल मे तेरा 'शुभ' रहेगा
    Subodh Sharma "Subh"
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