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नहीं देखा मैं आँखों के अलावा और कुछ फिर भी
मुझे कोई तो बतलाए था कैसा ज़हर आँखों में
मैं तो देखा था मुस्तक़बिल उसी शादाब आँखों में
दिखा भी तो नहीं कैसे बसा था शहर आँखों में
समुंदर जैसी ही मुझ को दिखी आँखों की गहराई
सुना आवाज़ जोरों से था जैसे लहर आँखों में
मुझे कोई तो बतलाए था क्या हाथों में भी उस के
रहा मैं देखता उसकों मोहब्बत दहर आँखों में
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फ़ासलों का ही था वो दीवार कैसे तोड़ सकते
ईश्क ना होता तो टूटे दिल को कैसे जोड़ सकते
ईश्क ना होता तो टूटे दिल को कैसे जोड़ सकते
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चाह कर के भी तुझे मैं ये बता सकता नहीं
है मुझे तुझ से मोहब्बत भी जता सकता नहीं
Read Fullहै मुझे तुझ से मोहब्बत भी जता सकता नहीं
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मुझ को उस ने तो पलट कर भी ना देखा
जो मोहब्बत का कभी दा'वा था करता
जो मोहब्बत का कभी दा'वा था करता
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हिज्र की वो रात थी और रात भर सोया नहीं
जिस पे मरता था मिरे मरने पे वो रोया नहीं
जिस पे मरता था मिरे मरने पे वो रोया नहीं
आस्तीं से पोछता आँसू रहा हर बार मैं
कोई इकलौती नहीं थी वो जिसे खोया नहीं
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हर बात वो कह दी छुपाया कुछ नहीं
हर बात कह कर भी बताया कुछ नहीं
हर बात कह कर भी बताया कुछ नहीं
हर वक़्त वो कहती ख़िलाफ़-ए-क़ाइदा
हर बार कह कर भी सिखाया कुछ नहीं
कहती रही कैसे गुज़ारें ज़िंदगी
वो सिर्फ़ कहती थी दिखाया कुछ नहीं
मैं मानता हूँ मैं बुरा तो हूँ मगर
उस ने किसी को तो बताया कुछ नहीं
मशकूर तो हूँ छोड़ जाने का मगर
उस ने मुझे भी तो जताया कुछ नहीं
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