नहीं मैं जानता नूर-ए-बसर था ज़हर आँखों में
उसे ऐसे रहा मैं देख जैसे क़हर आँखों में
नहीं देखा मैं आँखों के अलावा और कुछ फिर भी
मुझे कोई तो बतलाए था कैसा ज़हर आँखों में
मैं तो देखा था मुस्तक़बिल उसी शादाब आँखों में
दिखा भी तो नहीं कैसे बसा था शहर आँखों में
समुंदर जैसी ही मुझ को दिखी आँखों की गहराई
सुना आवाज़ जोरों से था जैसे लहर आँखों में
मुझे कोई तो बतलाए था क्या हाथों में भी उस के
रहा मैं देखता उसकों मोहब्बत दहर आँखों में
— Kanz Al Rida















