नहीं था ख़ौफ़ भी हम को कि बदनाम-ए-मोहब्बत हो
हमें तो शौक़ था बस इक दफ़ा उस की ज़ियारत हो
उसे तो ये ख़बर तक भी नहीं है हम कहाँ कब से
उसे ही छोड़ कर सब चाहते हैं बस ज़मानत हो
तलाश-ए-'इश्क़ हम तो शहर के हर इक गली में भी
दुआ में अब ख़ुदा से माँगते हैं कुछ करामत हो
ख़ुदा के ही हवाले तो है रूह-ए-आलम-ए-इम्काँ
ख़ुदा से इल्तिज़ा है बस कि अब जाम-ए-इनायत हो
चले फिर दे इजाज़त भी क़रीब-उल-मौत आने हैं
ख़ुदा से तो अभी कुछ वक़्त तहज़ीब-ए-'इबादत हो
— Kanz Al Rida















