Prakash Pandey

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    दस्तूर-ए-इश्क़ में गर हम पे दिल तेरा भी निसार होता
    तो नींद की इनायत होती और आँखों में क़रार होता

    ये तेरी दिल-फ़रोज़ बातें ये तेरे उल्फ़त के वादे
    हसीन होती ये ज़िंदगी अगर तुझ पे ऐतबार होता

    ये इशरत-ए-दीद शराब सी है पर दीद तेरी उधार सी है
    कि फेर लेते तुझ से नज़रें गर इन पे इख़्तियार होता

    तेरी चाहत की चाहत में हम सब कुछ भूले बैठे हैं
    ऐ काश तुझ से न प्यार होता न प्यार का इंतिज़ार होता

    ये सोहबत की रुसवाई है गर क़ुर्बत में तन्हाई है
    जो दरमियाँ न दीवार होता हाल-ए-दिल आश्कार होता

    यूँ जीना तो दुश्वार है ये पर क्या कीजे कि प्यार है ये
    हाँ गर तू ग़म-गुसार होता तो ये दिल ख़ुश-गवार होता
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    Prakash Pandey
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    जब देखा उनकी आँखों में मौसम बहार के
    शौक़-ए-दिल ये रुख़ देखूँ काग़ज़ पे उतार के

    मैं क्या कुछ कह दूँ उस इक आन की नज़ाकत पे
    झुकती हैं उनकी नज़रें जब मुझको पुकार के

    ये साज़-ए-लब हैं उनके या है शीत रागिनी
    छू कर जो ऐसे गुज़रे हैं ये धुन सितार के

    आहा वो क्या शब वो मंज़र वो रंग-ए-अंदाज़
    यूँ देखे हैं जब वो मुझ को गेसू सँवार के

    है ये उनका वादा आएँगे आज नींद में
    पर सोने की फ़ुर्सत तो दें ये दिन ख़ुमार के

    या रब लिख दे उनकी क़ुर्बत मेरे नसीब में
    मुश्किल है जीना ऐसे तस्वीरें निहार के
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    Prakash Pandey
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    ख़फ़ा क्यूँ हो ऐसे ज़रा मुस्कुरा दो
    ख़ता ग़र मिरी है तो मुझको सज़ा दो

    नहीं रुक रहे हैं ये आँसू तुम्हारे
    लो ऐसा करो तुम मुझे भी रुला दो

    बिना तुमको देखे जी लगता नहीं है
    सो रुख़ से तुम अपने ये पर्दा हटा दो

    सताता है मुझको तग़ाफ़ुल तुम्हारा
    मुझे बेरुख़ी का सबब तुम बता दो

    ये चाहत है ऐसी कि सब कुछ लुटा दूँ
    सुनो मेरी चाहत का कुछ तो सिला दो

    कि करनी हैं बातें लबों को लबों से
    चलो जान-ए-जाँ अब ये दूरी मिटा दो
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    बाद मुद्दत के झुकीं हैं पलकें उनकी
    देखो शायद कुछ तो कहना चाहते हैं
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    अब चैन इस दिल को मिले कैसे
    रोज़ एक हसरत जाग जाती है
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    रख दे जो हाथ दिल पे तो शायद चैन आ जाए
    नादाँ मेरे दिल तक कोई दवा नहीं जाती
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    लफ़्ज़ों की हिद्दत से पिघला था मोम की मानिंद
    लगा के पहरे होंठों पे फिर पत्थर बना दिया

    हसीन लम्हों से भर देता मैं दामन उनका
    इक तूफ़ाँ-ए-रंजिश ने पर आँचल उड़ा दिया
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    हुस्न का ज़ोम है आप को बेहिसाब
    नज़रें ये आप से हट न जाएँ कहीं
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    उनसे करने गए इश्क़ के मसअलों के हिसाब
    हँसके कहने लगे आपको नींद तो आती है
    Prakash Pandey
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    इक अधूरी कहानी जिए जा रहे हैं
    ज़ख़्म को ज़ख़्म से हम सिए जा रहे हैं

    जिस सबा से ब-ज़ाहिर अदावत है हमको
    हम ये साँसें उसी की लिए जा रहे हैं

    दो दिनों के त’अल्लुक़ ने नींदें उड़ा दीं
    अब जगे जा रहे हैं जिए जा रहे हैं

    रंज-ओ-ग़म में थी माँगी दवा हमने उनसे
    बेरुख़ी बेरुख़ी बस दिए जा रहे हैं

    हम समझते थे आक़िल कभी ख़ुद को जानाँ
    अब भला हम ये क्या-क्या किए जा रहे हैं
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    Prakash Pandey
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