इक अधूरी कहानी जिए जा रहे हैं
ज़ख़्म को ज़ख़्म से हम सिए जा रहे हैं
जिस सबास ब-ज़ाहिर अदावत है हमको
हम ये साँसें उसी की लिए जा रहे हैं
दो दिनों के त’अल्लुक़ ने नींदें उड़ा दीं
अब जगे जा रहे हैं जिए जा रहे हैं
रंज-ओ-ग़म में थी माँगी दवा हमने उन सेे
बेरुख़ी बेरुख़ी बस दिए जा रहे हैं
हम समझते थे आक़िल कभी ख़ुद को जानाँ
अब भला हम ये क्या-क्या किए जा रहे हैं
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