अक्स में अश्क को तुम बुलाना नहीं
याद को अब गले से लगाना नहीं
वो भला क्यूँ ही समझें अज़िय्यत मेरी
रब्त था जो उन्हें अब निभाना नहीं
जुर्म ये भी कि सोचा फ़क़त इश्क़ ही
इश्क़ ही हर किसी का तराना नहीं
इश्क़ को चाहिए अक़्ल की ढाल अब
सिर्फ़ दिल का बचा है ज़माना नहीं
जो सुना दूँ तुम्हें इक मुलाक़ात में
ये भला इतना छोटा फ़साना नहीं
— Prakash Pandey















