देखा जो हुस्न तो ख़्वाब ग़ज़लों के आते रहे

मत करो इश्क़ ये हुस्न वाले सिखाते रहे

प्यार की धुन लिए मैं चला जब ज़माने में तो
दिल फ़क़त छोड़ कर लोग हर शय दिखाते रहे

हाथ दो पाँव दो चारों इन के अलग कश्ती में
और हुनर देखो ये कश्ती को ही डुबाते रहे

आ रहा है तरस इस ज़माने के दीवानों पे
ये लुटाते रहे और वो आज़माते रहे

जो हुआ बे-वफ़ाई का चर्चा सर-ए-आम तो
रो दिए कुछ तो कुछ शक्ल अपनी छुपाते रहे

— Prakash Pandey

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