सारी हिकायत तो मियांँ आईने जैसी साफ़ थी
    तुमने ही अपने ज़ेहन में रिश्तों को पेचीदा किया
    shahnawaaz khan
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    लफ़्ज़ों में क्या बयान हो कर्बल की तिश्नगी
    प्यासी रही फ़ुरात पे रोना पड़ा मुझे
    shahnawaaz khan
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    ज़िंदगी तुझसे इस लड़ाई में
    मौत इक रोज़ जीत जाएगी
    shahnawaaz khan
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    ये मैं ही हूँ जो आज तक कुछ भी न अच्छा कर सका
    तूने तो मेरी जान जो कुछ भी किया अच्छा किया
    shahnawaaz khan
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    लड़ते-झगड़ते रंज से इक रोज़ यूंँ हुआ
    तन्हाई से, ख़लिश से मुझे प्यार हो गया
    shahnawaaz khan
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    दुआ करना हमारे हक़ में जब मर जाएँ ऐ लोगों
    कि अब तो ख़्वाब में क़ब्रों की तन्हाई रुलाती है
    shahnawaaz khan
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    खेल का हिस्सा थे जब तक खेल बस इक खेल था
    राज़ सारे खुल गए जब मैं तमाशाई हुआ
    shahnawaaz khan
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    सहरा में इक दरख़्त उगा के रहूँगा मैं
    इक रोज़ ख़ुद को ख़ुद से मिला के रहूँगा मैं

    माज़ी के ग़म को दिल से मिटा के रहूँगा मैं
    इस तरह अपने हाल को पा के रहूँगा मैं

    जिस तौर जल रहा हूँ ख़ुदी की तलाश में
    दुनिया तिरी बिसात जला के रहूँगा मैं

    मुश्किल हो रास्ता कि ये मुश्किल-तरीन हो
    अब के थकन को धूल चटा के रहूँगा मैं

    तू रंज दे के मुझको ज़माने यूँ ख़ुश न हो
    वहम-ओ-गुमान तेरा मिटा के रहूँगा मैं

    फिर लाख चाहे क्यों न करे पर्दा ज़िंदगी
    सोज़-ए-दरूँ से पर्दा उठा के रहूँगा मैं

    अब इस जहाँ से दूर कहीं इक ख़्याल में
    कोई नया जहान बना के रहूँगा मैं
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    shahnawaaz khan
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    मिट्टी तुम्हारे हिज्र की ज़रख़ेज़ हो गई
    अब शेर उगने लग गए दिल की ज़मीन पर
    shahnawaaz khan
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    क्या ख़बर कब ठहरने लग जाए
    साँस का ऐतबार कौन करे
    shahnawaaz khan
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