sehra men ik darakht ugaa ke rahoonga main | सहरा में इक दरख़्त उगा के रहूँगा मैं

  - shahnawaaz khan

सहरा में इक दरख़्त उगा के रहूँगा मैं
इक रोज़ ख़ुद को ख़ुद से मिला के रहूँगा मैं

माज़ी के ग़म को दिल से मिटा के रहूँगा मैं
इस तरह अपने हाल को पा के रहूँगा मैं

जिस तौर जल रहा हूँ ख़ुदी की तलाश में
दुनिया तिरी बिसात जला के रहूँगा मैं

मुश्किल हो रास्ता कि ये मुश्किल-तरीन हो
अब के थकन को धूल चटा के रहूँगा मैं

तू रंज दे के मुझको ज़माने यूँँ ख़ुश न हो
वहम-ओ-गुमान तेरा मिटा के रहूँगा मैं

फिर लाख चाहे क्यूँ न करे पर्दा ज़िंदगी
सोज़-ए-दरूँ से पर्दा उठा के रहूँगा मैं

अब इस जहाँ से दूर कहीं इक ख़याल में
कोई नया जहान बना के रहूँगा मैं

  - shahnawaaz khan

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