रेज़ा रेज़ा लम्हा लम्हा घट रही है ज़िंदगी
जानते सब हैं हक़ीक़त आरज़ी है ज़िंदगी
लग रहा है कोई अपना ही नहीं जैसे यहाँ
साथ ग़ैरों के हमारी यूँ कटी है ज़िंदगी
आते जाते मरहले ही उन्सियत को खा गए
कोफ़्त में गुज़रे, यक़ीनन तीरगी है ज़िंदगी
सब खिलाड़ी हार बैठे बाज़ियाँ अपनी यहाँ
खेल भी क्या क्या निराले खेलती है ज़िंदगी
रब से ग़ाफिल जो हुए तो, रंज-ओ-ग़म ही पाओगे
ऐन मुमकिन ख़्वार होना लाज़मी है ज़िंदगी
जो लकीरें देख कर दावा ख़ुदाई का करे
चल नजूमी ये बता, कितनी बची है ज़िंदगी
ख़ूब उजड़ा ख़ूब सँवरा आफ़तों से ये जहान
ता'क़यामत ऐ 'सना' ये आख़िरी है ज़िंदगी















