वो मेरी ज़िंदगी का अधूरा सा ख़्वाब है

मैं ख़ाक हूँ ज़मीं की वो इक माहताब है

ता'बीर जिस की मेरी समझ में न आ सकी
आँखों में मेरी आज भी इक ऐसा ख़्वाब है

रौशन है ज़ीस्त मेरी फ़क़त दम से उस के ही
मेरे लिए फ़लक का वही आफ़ताब है

मिलने से उस के मुझ को मिली सारी क़ाएनात
मेरी इबादतों का वो वाहिद सवाब है

पढ़ कर अगर वो ग़ौर से देखे कभी मुझे
उस के हर इक सवाल का मुझ
में जवाब है

उस से बिछड़ने का मैं तसव्वुर भी क्यूँ करूँ
जिस के बग़ैर जीना यक़ीनन अज़ाब है

कुछ इस लिए भी उस की है क़ीमत बढ़ी हुई
आख़िर को वो सना का हसीं इंतख़ाब है

— Sana Hashmi

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