Amol
Amol
Ghazal

अब हमें इस सफ़र से निकलना हैं

कुछ दिनों बा'द घर से निकलना हैं

हैं नदामत इलाही , रहम बरसा
इस ख़ुदा-ए-कहरस निकलना हैं

चूम लूँ हाथ बे- ख़ौफ़ उस के बस
ऐ वबा तेरे डर से निकलना हैं

रात के ख़्वाब जो याद देती हैं
बस मुझे उस सहरस निकलना हैं

याद कूचा -ए- जाँ पाँव को आए
अब मुझे इस शहर से निकलना हैं

तू हैं 'दीदार' , वो मुंतज़िर फिर भी ?
बद-अहद इस नजर से निकलना हैं

— Amol

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