हवा को ख़रीद'ने के लाले पडे हैं
हमारे कयामत से पाले पड़े हैं
हैं खायी वतन ने बहुत ठोकरें भी
मगर इस दफा पा में छाले पड़े हैं
अचानक लगी आग शमशान में क्या
कि इतनें शहर में उजाले पड़े हैं
निभाते नहीं तुम रँलीओं के वादे
तुम्हारी जबानों पें ताले पड़े हैं
हुआ हैं बड़ा अर्सा दोस्तों से मिल के
हैं ख़ाली खनकते जो प्याले पड़े हैं
सबब और फिर क्या जुदाई का पूछूँ
कि कानों से झुमके निकाले पडे हैं
— Amol















