एक दिन तो लॉटरी अपनी लगेगी
ज़िंदगी उसके लिए पूरी लगेगी
एक दिन हम साहिब-ए-मंसब भी होंगे
एक दिन मेरे भी सर पगड़ी लगेगी
वो मेरे पास से वापस अगर आकर नहीं जाता
तो मेरी आँख से उसका कभी पैकर नहीं जाता
जो उसके पास से होकर गुज़र जाए कभी तो फिर
बसर कोई भी हो अपने सलामत घर नहीं जाता
पहले तो उसको पढ़ाया बाप ने
उसको पैरों पर जमाया बाप ने
एक कर डाले थे अपने रात दिन
धूप में ख़ुद को जलाया बाप ने
तिरी डोली उठेगी तो जनाज़ा तो उठेगा ही
चलो मैं भी कफ़न पहनूँ चलो ख़ुद को सजा लो तुम