दिल से जब आह निकल जाएगी
जाँ भी हम-राह निकल जाएगी
दिल में कुछ भी तो न रह जाएगा
जब तिरी चाह निकल जाएगी
हम ने समझा था कि कुछ बरसों में
फ़स्ल-ए-जाँ-काह निकल जाएगी
फिर सभी जोड़ के सर बैठे हैं
फिर कोई राह निकल जाएगी
तुम से मिलने की भी कोई सूरत
इंशा-अल्लाह निकल जाएगी
— Iftikhar Raghib















