ai ibn-e-iztiraab dil-e-na-suboor sabr | ऐ इब्न-ए-इज़्तिराब दिल-ए-ना-सुबूर सब्र

  - Iftikhar Raghib

ऐ इब्न-ए-इज़्तिराब दिल-ए-ना-सुबूर सब्र
तकलीफ़ में है बाइ'स-ए-कैफ़-ओ-सुरूर सब्र

छट कर रहेगी तीरगी इक दिन गुरेज़ की
फूटेगा इल्तिफ़ात-ओ-मोहब्बत का नूर सब्र

आँखों में तैरते हैं अभी तक कई हुरूफ़
लिक्खा था उस ने अश्क से बैनस्सुतूर सब्र

मैं क्या करूँँ कि तुम को न हो बरहमी कभी
किस तरह दिल को आए तुम्हारे हुज़ूर सब्र

तुम से था दूर दूर तो साबिर था सख़्त था
शीशे की तरह पल में हुआ चूर चूर सब्र

दोनों ही ए'तिदाल पे 'राग़िब' न रह सके
था मेरा इज़्तिराब तो उन का क़ुसूर सब्र

  - Iftikhar Raghib

Aansoo Shayari

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