andaaz-e-sitam un ka nihaayat hi alag hai | अंदाज़-ए-सितम उन का निहायत ही अलग है

  - Iftikhar Raghib

अंदाज़-ए-सितम उन का निहायत ही अलग है
गुज़री है जो दिल पर वो क़यामत ही अलग है

ले जाए जहाँ चाहे हवा हम को उड़ा कर
टूटे हुए पत्तों की हिकायत ही अलग है

परदेस में रह कर कोई क्या पाँव जमाए
गमले में लगे फूल की क़िस्मत ही अलग है

जितना है समर जिस पे वो उतना है ख़मीदा
फलदार दरख़्तों की तबीअत ही अलग है

बाहरस तो लगता है कि शादाब है गुलशन
अंदर से हर इक पेड़ की हालत ही अलग है

हर एक ग़ज़ल तुझ से ही मंसूब है मेरी
अंदाज़ मिरा तेरी बदौलत ही अलग है

किस किस को बताऊँ कि मैं बुज़दिल नहीं 'राग़िब'
इस दौर में मफ़्हूम-ए-शराफ़त ही अलग है

  - Iftikhar Raghib

Khushboo Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Iftikhar Raghib

As you were reading Shayari by Iftikhar Raghib

Similar Writers

our suggestion based on Iftikhar Raghib

Similar Moods

As you were reading Khushboo Shayari Shayari