कमाल-ए-आदमी की इंतिहा है
    वो आइंदा में भी सब से बड़ा है

    कोई रफ़्तार होगी रौशनी की
    मगर वो उस से भी आगे गया है

    जहाँ बैठे सदा-ए-ग़ैब आई
    ये साया भी उसी दीवार का है

    मुजस्सम हो गए सब ख़्वाब मेरे
    मुझे मेरा ख़ज़ाना मिल गया है

    हक़ीक़त एक है लज़्ज़त में लेकिन
    हिकायत सिलसिला-दर-सिलसिला है

    यूँही हैराँ नहीं हैं आँख वाले
    कहीं इक आइना रक्खा हुआ है

    विसाल-ए-यार से पहले मोहब्बत
    ख़ुद अपनी ज़ात का इक रास्ता है

    सलामत आइने में एक चेहरा
    शिकस्ता हो तो कितना देखता है
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    Obaidullah Aleem
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    मैं कैसे जियूँ गर ये दुनिया हर आन नई तस्वीर न हो
    ये आते जाते रंग न हों और लफ़्ज़ों की तनवीर न हो

    ऐ राह-ए-इश्क़ के राही सुन चल ऐसे सफ़र की लज़्ज़त में
    तिरी आँखों में नए ख़्वाब तो हों पर ख़्वाबों की ताबीर न हो

    घर आऊँ या बाहर जाऊँ हर एक फ़ज़ा में मेरे लिए
    इक झूटी सच्ची चाहत हो रस्मों की कोई ज़ंजीर न हो

    जैसे ये मिरी अपनी सूरत मिरे सामने हो और कहती हो
    मिरे शाएर तेरे साथ हूँ मैं मायूस न हो दिल-गीर न हो

    कोई हो तो मोहब्बत ऐसी हो मुझे धूप और साए में जिस के
    किसी जज़्बे का आज़ार न हो किसी ख़्वाहिश की ताज़ीर न हो
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    Obaidullah Aleem
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    जवानी क्या हुई इक रात की कहानी हुई
    बदन पुराना हुआ रूह भी पुरानी हुई

    कोई अज़ीज़ नहीं मा-सिवा-ए-ज़ात हमें
    अगर हुआ है तो यूँ जैसे ज़िंदगानी हुई

    न होगी ख़ुश्क कि शायद वो लौट आए फिर
    ये किश्त गुज़रे हुए अब्र की निशानी हुई

    तुम अपने रंग नहाओ मैं अपनी मौज उड़ूँ
    वो बात भूल भी जाओ जो आनी-जानी हुई

    मैं उस को भूल गया हूँ वो मुझ को भूल गया
    तो फिर ये दिल पे क्यूँ दस्तक सी ना-गहानी हुई

    कहाँ तक और भला जाँ का हम ज़ियाँ करते
    बिछड़ गया है तो ये उस की मेहरबानी हुई
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    Obaidullah Aleem
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    दिल ही थे हम दुखे हुए तुम ने दुखा लिया तो क्या
    तुम भी तो बे-अमाँ हुए हम को सता लिया तो क्या

    आप के घर में हर तरफ़ मंज़र-ए-माह-ओ-आफ़्ताब
    एक चराग़-ए-शाम अगर मैं ने जला लिया तो क्या

    बाग़ का बाग़ आप की दस्तरस-ए-हवस में है
    एक ग़रीब ने अगर फूल उठा लिया तो क्या

    लुत्फ़ ये है कि आदमी आम करे बहार को
    मौज-ए-हवा-ए-रंग में आप नहा लिया तो क्या

    अब कहीं बोलता नहीं ग़ैब जो खोलता नहीं
    ऐसा अगर कोई ख़ुदा तुम ने बना लिया तो क्या

    जो है ख़ुदा का आदमी उस की है सल्तनत अलग
    ज़ुल्म ने ज़ुल्म से अगर हाथ मिला लिया तो क्या

    आज की है जो कर्बला कल पे है उस का फ़ैसला
    आज ही आप ने अगर जश्न मना लिया तो क्या

    लोग दुखे हुए तमाम रंग बुझे हुए तमाम
    ऐसे में अहल-ए-शाम ने शहर सजा लिया तो क्या

    पढ़ता नहीं है अब कोई सुनता नहीं है अब कोई
    हर्फ़ जगा लिया तो क्या शेर सुना लिया तो क्या
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    Obaidullah Aleem
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    अजीब थी वो अजब तरह चाहता था मैं
    वो बात करती थी और ख़्वाब देखता था मैं

    विसाल का हो कि उस के फ़िराक़ का मौसम
    वो लज़्ज़तें थीं कि अंदर से टूटता था मैं

    चढ़ा हुआ था वो नश्शा कि कम न होता था
    हज़ार बार उभरता था डूबता था मैं

    बदन का खेल थीं उस की मोहब्बतें लेकिन
    जो भेद जिस्म के थे जाँ से खोलता था मैं

    फिर इस तरह कभी सोया न इस तरह जागा
    कि रूह नींद में थी और जागता था मैं

    कहाँ शिकस्त हुई और कहाँ सिला पाया
    किसी का इश्क़ किसी से निबाहता था मैं

    मैं अहल-ए-ज़र के मुक़ाबिल में था फ़क़त शाएर
    मगर मैं जीत गया लफ़्ज़ हारता था मैं
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    तू अपनी आवाज़ में गुम है मैं अपनी आवाज़ में चुप
    दोनों बीच खड़ी है दुनिया आईना-ए-अल्फ़ाज़ में चुप

    अव्वल अव्वल बोल रहे थे ख़्वाब-भरी हैरानी में
    फिर हम दोनों चले गए पाताल से गहरे राज़ में चुप

    ख़्वाब-सरा-ए-ज़ात में ज़िंदा एक तो सूरत ऐसी है
    जैसे कोई देवी बैठी हो हुजरा-ए-राज़-ओ-नियाज़ में चुप

    अब कोई छू के क्यूँ नहीं आता उधर सिरे का जीवन-अंग
    जानते हैं पर क्या बतलाएँ लग गई क्यूँ पर्वाज़ में चुप

    फिर ये खेल-तमाशा सारा किस के लिए और क्यूँ साहब
    जब इस के अंजाम में चुप है जब इस के आग़ाज़ में चुप

    नींद-भरी आँखों से चूमा दिए ने सूरज को और फिर
    जैसे शाम को अब नहीं जलना खींच ली इस अंदाज़ में चुप

    ग़ैब-समय के ज्ञान में पागल कितनी तान लगाएगा
    जितने सुर हैं साज़ से बाहर उस से ज़ियादा साज़ में चुप
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    ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूँ
    काश तुझ को भी इक झलक देखूँ

    चाँदनी का समाँ था और हम तुम
    अब सितारे पलक पलक देखूँ

    जाने तू किस का हम-सफ़र होगा
    मैं तुझे अपनी जाँ तलक देखूँ

    बंद क्यूँ ज़ात में रहूँ अपनी
    मौज बन जाऊँ और छलक देखूँ

    सुब्ह में देर है तो फिर इक बार
    शब के रुख़्सार से ढलक देखूँ

    उन के क़दमों तले फ़लक और मैं
    सिर्फ़ पहनाई-ए-फ़लक देखूँ
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    Obaidullah Aleem
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    मैं ये किस के नाम लिक्खूँ जो अलम गुज़र रहे हैं
    मिरे शहर जल रहे हैं मिरे लोग मर रहे हैं

    कोई ग़ुंचा हो कि गुल हो कोई शाख़ हो शजर हो
    वो हवा-ए-गुलिस्ताँ है कि सभी बिखर रहे हैं

    कभी रहमतें थीं नाज़िल इसी ख़ित्ता-ए-ज़मीं पर
    वही ख़ित्ता-ए-ज़मीं है कि अज़ाब उतर रहे हैं

    वही ताएरों के झुरमुट जो हवा में झूलते थे
    वो फ़ज़ा को देखते हैं तो अब आह भर रहे हैं

    बड़ी आरज़ू थी हम को नए ख़्वाब देखने की
    सो अब अपनी ज़िंदगी में नए ख़्वाब भर रहे हैं

    कोई और तो नहीं है पस-ए-ख़ंजर-आज़माई
    हमीं क़त्ल हो रहे हैं हमीं क़त्ल कर रहे हैं
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    Obaidullah Aleem
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    कुछ दिन तो बसो मिरी आँखों में
    फिर ख़्वाब अगर हो जाओ तो क्या

    कोई रंग तो दो मिरे चेहरे को
    फिर ज़ख़्म अगर महकाओ तो क्या

    जब हम ही न महके फिर साहब
    तुम बाद-ए-सबा कहलाओ तो क्या

    इक आइना था सो टूट गया
    अब ख़ुद से अगर शरमाओ तो क्या

    तुम आस बंधाने वाले थे
    अब तुम भी हमें ठुकराओ तो क्या

    दुनिया भी वही और तुम भी वही
    फिर तुम से आस लगाओ तो क्या

    मैं तन्हा था मैं तन्हा हूँ
    तुम आओ तो क्या न आओ तो क्या

    जब देखने वाला कोई नहीं
    बुझ जाओ तो क्या गहनाओ तो क्या

    अब वहम है ये दुनिया इस में
    कुछ खोओ तो क्या और पाओ तो क्या

    है यूँ भी ज़ियाँ और यूँ भी ज़ियाँ
    जी जाओ तो क्या मर जाओ तो क्या
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    Obaidullah Aleem
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    अज़ीज़ इतना ही रक्खो कि जी सँभल जाए
    अब इस क़दर भी न चाहो कि दम निकल जाए

    मिले हैं यूँ तो बहुत आओ अब मिलें यूँ भी
    कि रूह गर्मी-ए-अनफ़ास से पिघल जाए

    मोहब्बतों में अजब है दिलों को धड़का सा
    कि जाने कौन कहाँ रास्ता बदल जाए

    ज़हे वो दिल जो तमन्ना-ए-ताज़ा-तर में रहे
    ख़ोशा वो उम्र जो ख़्वाबों ही में बहल जाए

    मैं वो चराग़ सर-ए-रहगुज़ार-ए-दुनिया हूँ
    जो अपनी ज़ात की तन्हाइयों में जल जाए

    हर एक लहज़ा यही आरज़ू यही हसरत
    जो आग दिल में है वो शेर में भी ढल जाए
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    Obaidullah Aleem
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