Waheed Akhtar

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Waheed Akhtar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Waheed Akhtar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

अफ़्सुर्दगी-ए-इश्क़ के खुलते नहीं अस्बाब क्या बात भुला बैठे हैं क्या याद नहीं है — Waheed Akhtar
उम्र भर मिलते रहे फिर भी न मिलने पाए इस तरह मिल कि मुलाक़ात मुकम्मल हो जाए — Waheed Akhtar
जो सुनना चाहो तो बोल उट्ठेंगे अँधेरे भी न सुनना चाहो तो दिल की सदा सुनाई न दे — Waheed Akhtar

Ghazal

कतरा के गुल्सिताँ से जो सू-ए-क़फ़स चले ऐसी कोई हवा भी तो अब के बरस चले आदाब-ए-क़ाफ़िला भी हैं ज़ंजीर-ए-पा-ए-शौक़ ये क्या सफ़र असीर-ए-सदा-ए-जरस चले माना हवा-ए-गुल से थे बे-इख़्तियार हम फिर भी बचा के राह का हर ख़ार-ओ-ख़स चले पामाल हो के रह गए जश्न-ए-बहार में ये फ़िक्र थी चमन पे ख़िज़ाँ का न बस चले ऐ चश्मा-ए-हयात न दी तू ने बूँद भी हम तिश्ना-काम अब्र की सूरत बरस चले सुब्हें भी आ के ज़हर रग-ए-जाँ में भर न दें हिज्रान-ए-यार तेरे अँधेरे तो डस चले उन की ये ज़िद वो देखें गदा-ए-रफ़ू हमें हम को ये फ़िक्र उन के गरेबाँ पे बस चले था पास-ए-आबरू-ए-तमन्ना हमें 'वहीद' चुन कर गुल-ए-मुराद सब अहल-ए-हवस चले — Waheed Akhtar
क्यूँँ तिरी क़ंद-लबी ख़ुश-सुख़नी याद आई ज़हर-अफ़्शानी-ए-दुन्या-ए-दनी याद आई पए-गुल-गश्त-ए-चमन फिर दिल-ए-दीवाना चला फिर तिरी सर्व-क़दी गुल-बदनी याद आई जब किसी जिस्म पे सजते हुए देखा है लिबास तेरी ख़ुश-क़ामती ख़ुश-पैरहनी याद आई यूँँ निबाहा तिरा वा'दा तिरे ग़म ने बरसों ग़म-ए-अय्याम की पैमाँ-शिकनी याद आई जाम उठाते ही दिल उमडा तो भर आईं आँखें चश्म-ए-साक़ी तिरी साग़र-शिकनी याद आई याद आई न कभी बे-सर-ओ-सामानी में देख कर घर को ग़रीब-उल-वतनी याद आई आज दिखलाते गुल-अफ़्शानी-ए-गुफ़्तार 'वहीद' लग गई चुप जो वो ग़ुंचा-दहनी याद आई — Waheed Akhtar
कहीं शुनवाई नहीं हुस्न की महफ़िल के ख़िलाफ़ गुल न क्यूँँ हँसते रहें शोर-ए-अनादिल के ख़िलाफ़ जान-ओ-ईमाँ भी वही दुश्मन-ए-जान-ओ-ईमाँ हम गवाही भी न देंगे कहीं क़ातिल के ख़िलाफ़ किसी जादे पे चलो छोड़ेगी तन्हाई न साथ क़दम उट्ठें तो किधर इश्क़ की मंज़िल के ख़िलाफ़ बज़्म-ए-याराँ हो कि मय नग़्मा के फ़ैज़ान-ए-सुख़न सब हैं साज़िश में शरीक उस की मिरे दिल के ख़िलाफ़ हिज्र में जी के बहलने के थे जितने हीले वहशत इक साथ रही हो गए सब मिल के ख़िलाफ़ इसी आग़ोश में दम तोड़ेंगी आ कर मौजें भागती फिरती हैं बेकार ही साहिल के ख़िलाफ़ अक़्ल-ए-दुनिया का तुम्हें दा'वा है बे-वज्ह 'वहीद' दो-क़दम चल नहीं सकते कभी तुम दिल के ख़िलाफ़ — Waheed Akhtar
रहे वो ज़िक्र जो लब-हा-ए-आतिशीं से चले चले वो दूर जो रफ़्तार-ए-सात्गीं से चले हज़ारों साल सफ़र कर के फिर वहीं पहुँचे बहुत ज़माना हुआ था हमें ज़मीं से चले ख़िरद बनी रही ज़ंजीर-ऐ-पा-ऐ-शौक़ मगर जुनूँ के जितने भी हैं सिलसिले हमीं से चले फ़ुरात जीत के भी तिश्ना-लब रही ग़ैरत हज़ार तीर-ए-सितम ज़ुल्म की कमीं से चले ज़माना एक ही रस्ते पे ला के छोड़ेगा रवाँ है एक ही धारा कोई कहीं से चले गुमान-ओ-शक के दो-राहे पे हम से आ के मिले वो क़ाफ़िले जो किसी मंज़िल-ए-यक़ीं से चले हमें शिकस्त-ए-हरीफ़ां का भी मलाल रहा शिकस्ता-दिल जो हम उस बज़्म-ए-दिल-नशीं से चले तमाम गुमरहियाँ दैर और हरम में पलीं तमाम सिलसिला-ए-कुफ़्र अहल-ए-दीं से चले 'वहीद' सैल-ए-क़यामत ने राह रोकी थी जो बन के अश्क हम उस चश्म-ऐ-नाज़नीनीं से चले — Waheed Akhtar
आँख जो नम हो वही दीदा-ए-तर मेरा है मौज-ए-ग़म उट्ठे कहीं उस का गुहर मेरा है देख लूँ मैं तो सितारे हैं न देखूँ तो धुआँ क्या रसा इतना कफ़-ए-दस्त-ए-नज़र मेरा है समर ओ गुल हैं गुलिस्तान-फ़रोशों के लिए आबयारी के लिए ख़ून-ए-जिगर मेरा है क़स्र हो या कि लहद दोनों किरायें के मकाँ रोज़ कहता है कोई आ के ये घर मेरा है दश्त की उड़ती हुई रेत पे लिख देते हैं लोग ये ज़मीं मेरी ये दीवार ये दर मेरा है इस शर-आबाद ख़राबे में कहाँ हुस्न-ओ-जमाल हुस्न जितना भी है सब हुस्न-ए-नज़र मेरा है मौत है जुरअत-ए-इज़हार की पज़मुर्दा-लबी साज़-ए-तख़लीक़ लब-ए-अर्ज़-ए-हुनर मेरा है वो ख़ुदा हो तो हो मैं ढूँडने क्यूँँ जाऊँ उसे ख़ुद ही अपना ले मुझे बढ़ के वो गर मेरा है कट के सर पढ़ते हैं नेज़ों पे भी क़ुरआन 'वहीद' जुज़्व-ए-तन रह के भी चुप किस लिए सर मेरा है — Waheed Akhtar
सहराओं में दरिया भी सफ़र भूल गया है मिट्टी ने समुंदर का लहू चूस लिया है दुनिया की मलामत का भी अब ख़ौफ़ है दिल को ख़ाशाक ने मौजों को गिरफ़्तार किया है मंज़िल है न जादा है न साया है न पानी तन्हाई का एहसास फ़क़त राह-नुमा है सूरज भी पड़ा रोता है इक गहरे कुएँ में बरसों हुए आकाश भी धुँदलाया हुआ है बिछड़े हुए ख़्वाब आ के पकड़ लेते हैं दामन हर रास्ता परछाइयों ने रोक लिया है किरनों से तराशा हुआ इक नूर का पैकर शरमाया हुआ ख़्वाब की चौखट पे खड़ा है फूलों से लदी टहनियाँ फैलाए हैं बाँहें ख़ुश्बू का बदन ख़ाक में पामाल पड़ा है दीवार-ओ-दर-ए-शहर पे हैं ख़ून के धब्बे रंगों का हसीं क़ाफ़िला सहरा में लुटा है — Waheed Akhtar
हम जो टूटे तो ग़म-ए-दहर का पैमाना बने ख़ाक में मिल के भी ख़ाक-ए-रह-ए-मय-खाना बने कौन इस बज़्म में समझेगा ग़म-ए-दिल की ज़बाँ बात छोटी सी जब अफ़्साना-दर-अफ़्साना बने संग-अंदाज़ों से ऊँचा है बहुत अपना मक़ाम वर्ना मुमकिन था निशाना सर-ए-दीवाना बने शहर-ए-जानाँ से भी हम लाए मोहब्बत का ख़िराज क्या ज़रूरी है कि याँ वज़-ए-गदायाना बने वहशत आमादा-ए-रुसवाई है बे-ख़ौफ़ जहाँ ज़ब्त का है ये तक़ाज़ा कि तमाशा न बने ज़िंदगी हम तिरे इतने तो ख़ता-वार न थे कि जिसे अपना बनाएँ वही बेगाना बने इक तमन्ना कोई ऐसा तो बड़ा जुर्म न थी आँख ता-मर्ग छलकता हुआ पैमाना बने क्या रिफ़ाक़त है यही ऐ दिल-ए-आशुफ़्ता-मिज़ाज देख हम एक तिरे वास्ते क्या क्या न बने अजनबी लगते हैं हम अपनी नज़र को ख़ुद ही आप अपने से न इतना कोई बेगाना बने हम पे इक उम्र से तारी है ख़मोशी ऐसी एक नक़्शे पे सिमट जाए तो अफ़्साना बने ऐ मिरे हौसला-ए-ग़म है यही वक़्त-ए-वफ़ा ज़हर ही हासिल-ए-सद-उम्र-ए-तमन्ना न बने ज़िंदगी करने के अंदाज़ तो भूलो न 'वहीद' तुम ने क्या सीखा अगर इश्क़ सलीक़ा न बने — Waheed Akhtar
लिपटी हुई फिरती है नसीम उन की क़बास गुल खिलते हैं हर गाम पे दामन की हवा से दिल ऐसा दिया क्यूँँ कि रहा कुश्ता-ए-जानाँ तुम से नहीं ये शिकवा भी करना है ख़ुदा से महरम हैं हमीं गर्मी-ए-गुफ़्तार से उन की जो होंट जो आँखें हैं गिराँ-बार हया से आहिस्ता करो चाक गुलो अपना गरेबाँ गूँजे न चमन ग़ुंचों के हँसने की सदा से खोलेंगे उन्हीं हाथों के नाख़ुन गिरह-ए-दिल जो बस्ता हैं रंगीनी-ओ-ख़ुशबू-ए-हिना से ता'बीर के सहराओं में हैं ख़्वाब-ए-परेशाँ दरिया को सराबों से सदा देते हैं प्यासे लेते हो अगर नाम-ए-शहीदाँ तो है ये शर्त जाँ जाए रहे पा न हटें राह-ए-वफ़ा से — Waheed Akhtar
दीवानों को मंज़िल का पता याद नहीं है जब से तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा याद नहीं है अफ़्सुर्दगी-ए-इश्क़ के खुलते नहीं अस्बाब क्या बात भुला बैठे हैं क्या याद नहीं है हम दिल-ज़दगाँ जीते हैं यादों के सहारे हाँ मिट गए जिस पर वो अदा याद नहीं है घर अपना तो भूली ही थी आशुफ़्तगी-ए-दिल ख़ुद-रफ़्ता को अब दर भी तिरा याद नहीं है लेते हैं तिरा नाम ही यूँँ जागते सोते जैसे कि हमें अपना ख़ुदा याद नहीं है ये एक ही एहसान-ए-ग़म दोस्त है क्या कम बे-मेहरी-ए-दौराँ की जफ़ा याद नहीं है बे-बरसे गुज़र जाते हैं उमडे हुए बादल जैसे उन्हें मेरा ही पता याद नहीं है इस बार 'वहीद' आप की आँखें नहीं बरसीं क्या झूमती ज़ुल्फ़ों की घटा याद नहीं है — Waheed Akhtar
अँधेरा इतना नहीं है कि कुछ दिखाई न दे सुकूत ऐसा नहीं है जो कुछ सुनाई न दे जो सुनना चाहो तो बोल उट्ठेंगे अँधेरे भी न सुनना चाहो तो दिल की सदा सुनाई न दे जो देखना हो तो आईना-ख़ाना है ये सुकूत हो आँख बंद तो इक नक़्श भी दिखाई न दे ये रूहें इस लिए चेहरों से ख़ुद को ढाँपे हैं मिले ज़मीर तो इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई न दे कुछ ऐसे लोग भी तन्हा हुजूम में हैं छुपे कि ज़िंदगी उन्हें पहचान कर दुहाई न दे हूँ अपने-आप से भी अजनबी ज़माने के साथ अब इतनी सख़्त सज़ा दिल की आशनाई न दे सभी के ज़ेहन हैं मक़रूज़ क्या क़दीम ओ जदीद ख़ुद अपना नक़्द-ए-दिल-ओ-जां कहीं दिखाई न दे बहुत है फ़ुर्सत-ए-दीवानगी की हसरत भी 'वहीद' वक़्त गर इज़्न-ए-ग़ज़ल-सराई न दे — Waheed Akhtar
तेरी गली में जो मिला उस से पता पूछा तिरा सब तुझ से थे ना-आश्ना पर सब में था शोहरा तिरा कोई न था जब आश्ना हम ने किया चर्चा तिरा ऐ हर किसी के आश्ना अब हम से क्या रिश्ता तिरा तू जब हुआ पीर-ए-मुग़ाँ थे सब ही तेरे मद्ह-ख़्वाँ रह कर ख़मोश ऐ ख़ुद-निगर हम ने भरम रक्खा तिरा उन से तअ'ल्लुक़ क़त्अ कर जिन से हुआ तू मो'तबर रख ना-शनासों पर नज़र रह जाएगा पर्दा तिरा औरों के नक़्श-ए-पा पे हम किस तरह से रखते क़दम लाखों नुक़ूश-ए-पास था छलका हुआ जादा तिरा तू कर उन्हीं पर सख़्तियाँ रौशन है जिन से तेरी जाँ उन पर ही तू रह मेहरबाँ करते हैं जो सौदा तिरा बरसों से हैं दीदा-वराँ तेरी गली में सरगिराँ सब कुछ धरा रह जाएगा चल दे जो बंजारा तिरा है ये हमारा ही लहू अब तक रहा तू सुर्ख़-रू हम दें न जिस दिन ख़ूँ-बहा बुझ जाएगा चेहरा तिरा ऐ शहर-ए-मर्दुम-ना-शनास ऐ बज़्म-ए-फ़न-ना-आशना सन्नाटे बोलेंगे यहाँ छोड़ें जो हम कूचा तिरा तू मुनफ़रिद आलम से है ये सब हमारे दम से है मुल्क-ए-सुख़न में हम से ही गूँजा हुआ नग़्मा तिरा हो जब तिरा क़िस्सा रक़म और रोक लें इक हम क़लम किस ज़िक्र किस उनवान से फिर नाम आएगा तिरा — Waheed Akhtar
तुम गए साथ उजालों का भी झूटा ठहरा रोज़-ओ-शब अपना मुक़द्दर ही अँधेरा ठहरा याद करते नहीं इतना तो दिल-ए-ख़ाना-ख़राब भूला-भटका कोई दो रोज़ अगर आ ठहरा कोई इल्ज़ाम नसीम-ए-सहरी पर न गया फूल हँसने पे ख़तावार अकेला ठहरा पत्तियाँ रह गईं बू ले उड़ी आवारा सबा क़ाफ़िला मौज-ए-बहाराँ का बस इतना ठहरा रोज़ नज़रों से गुज़रते हैं हज़ारों चेहरे सामने दिल के मगर एक ही चेहरा ठहरा वक़्त भी सई-ए-मदावा-ए-अलम कर न सका जब से तुम बिछड़े हो ख़ुद वक़्त है ठहरा ठहरा दिल है वो मोम मिला है जिसे शम्ओं' का गुदाज़ अब कोई देखे न देखे यूँँही जलना ठहरा तुम ने जो शम्अ' जलाई थी न बुझने पाए अब तो ले-दे के यही काम हमारा ठहरा गुनगुना लेंगे ग़ज़ल आज 'वहीद'-अख़्तर की नाम लेना ही जो दर-पर्दा तुम्हारा ठहरा — Waheed Akhtar
ख़ुश्बू है कभी गुल है कभी शम्अ' कभी है वो आतिश-ए-सय्याल जो सीने में भरी है बादा-तलबी शौक़ की दरयूज़ा-गरी है सद-शुक्र कि तक़दीर ही याँ तिश्ना-लबी है ग़ुंचों के चटकने का समाँ दिल में अभी है मिलने में जो उठ उठ के नज़र उन की झुकी है अब ज़ब्त से कह दे कि ये रुख़्सत की घड़ी है ऐ वहशत-ए-ग़म देर से क्या सोच रही है मासूम है याद उन की भटक जाए न रस्ता ख़ूँ-गश्ता तमन्नाओं की क्यूँँ भीड़ लगी है यादों से कहो सोला-सिंगार आज कराएँ आईना-ब-कफ़ हसरत-ए-दीदार खड़ी है लब सी लिए अंदेशा-ए-दुश्नाम-ए-जहाँ से अब अपनी ख़मोशी ही इक अफ़्साना बनी है ठहरी है तो इक चेहरे पे ठहरी रही बरसों भटकी है तो फिर आँख भटकती ही रही है — Waheed Akhtar
इक दश्त-ए-बे-अमाँ का सफ़र है चले-चलो रुकने में जान ओ दिल का ज़रर है चले-चलो हुक्काम ओ सारेक़ीन की गो रह-गुज़र है घर फिर भी बराए-बैत तो दर है चले-चलो मस्जिद हो मदरसा हो कि मज्लिस कि मय-कदा महफ़ूज़ शर से कुछ है तो घर है चले-चलो ज़ुल्मत है याँ भी वाँ भी अंधेरे ही हों तो क्या नूर इक वरा-ए-हद्द-ए-नज़र है चले-चलो उतरा किनार-ए-बहर-ए-अत्श एक क़ाफ़िला ख़त्म उस पे तिश्नगी का सफ़र है चले-चलो सर तक पहुँच न जाए कोई तेज़-गाम लहर याँ ख़ूँ की मौज ता-ब-कमर है चले-चलो जाँ के ज़ियाँ का डर है तलब में अगर तो हो तर्क-ए-तलब में भी तो ख़तर है चले-चलो — Waheed Akhtar
हम को मंज़ूर तुम्हारा जो न पर्दा होता सारा इल्ज़ाम सर अपने ही न आया होता दोस्त-अहबाब भी बे-गाने नज़र आते हैं काश इक शख़्स को इतना भी न चाहा होता मुफ़्त माँगा था किसी ने सो उसे बख़्श दिया ऐसा सस्ता भी न था दिल जिसे बेचा होता जान कर हम ने किया ख़ुद को ख़राब-ओ-रुसवा वर्ना हम वो थे फ़रिश्तों ने भी पूजा होता अहल-ए-दुनिया को बहुत हम से भी उम्मीदें थीं ज़िंदगी तुझ से मगर अपना न झगड़ा होता नासेहो हम को भी अंजाम-ए-जुनूँ है मालूम उस को समझाओ जो ये सब न समझता होता वो ख़िरद-मंद वो बाहोश 'वहीद' आज कहाँ मिलने वालों से कभी तुम ने ये पूछा होता — Waheed Akhtar
उन को रोज़ इक ताज़ा हीला एक ख़ंजर चाहिए हम को रोज़ इक जाँ नई और इक नया सर चाहिए इल्तिफ़ात ओ सरगिरानी पर ख़ुशी क्या रंज क्या कुछ बहाना इस से बढ़ कर दीदा-ए-तर चाहिए क्या दिखाएँ ख़ुश्क लब दो बूँद के साक़ी हैं सब प्यास सहरा-ए-अज़ल उस को समुंदर चाहिए सच की इक नन्ही सी कोंपल को कुचलने के लिए झूट और दुश्नाम के लश्कर के लश्कर चाहिए सब्र का दामान-ए-दौलत है अमीरों का अमीर जब्र की दरयूज़्गी को सैंकड़ों दर चाहिए बुत बनाने पूजने फिर तोड़ने के वास्ते ख़ुद-परस्ती को नया हर रोज़ पत्थर चाहिए हम ने जिस दुनिया को ठुकराया था उन के वास्ते मिल गए वो तो उसी दुनिया का चक्कर चाहिए — Waheed Akhtar
रुख़्सत-ए-नुत्क़ ज़बानों को रिया क्या देगी दर्स हक़-गोई का ये बिंत-ए-ख़ता क्या देगी सज्दा करती है लईमों के दरों पर दुनिया बे-नियाज़ों को ये बे-शर्म भला क्या देगी यही होगा कि न आएगी कभी घर मेरे मुझ को दुनिया-ए-दुनी और सज़ा क्या देगी साल-हा-साल के तूफ़ाँ में भी दिल बुझ न सका ज़क उसे सरकशी-ए-मौज-ए-हवा क्या देगी कोई मौसम हो महकते हैं यहाँ ज़ख़्म के फूल मेरे दामन को तही-दस्त सबा क्या देगी दिल तो कुछ कहता है पर शर्म से उठते नहीं हाथ देखना है कि ये बे-दस्त दुआ क्या देगी ख़्वाहिश-ए-मर्ग है कुछ पाने की मौहूम उम्मीद ज़िंदगी दे न सकी कुछ तो क़ज़ा क्या देगी ख़्वाब देखे हैं तो बेदार रहो उम्र तमाम चश्म-ए-ख़्वाबीदा को ताबीर-ए-सिला क्या देगी इसी ज़िंदान में अब काट दो उम्र अपनी 'वहीद' मैं न कहता था तुम्हें क़ैद-ए-वफ़ा क्या देगी — Waheed Akhtar
आग अपने ही दामन की ज़रा पहले बुझा लो फ़ुर्सत हो तो फिर हम को भी जलने से बचा लो ऐ क़िस्मत-ए-फ़र्दा के ख़ुश-आइंद ख़यालो रातें न सही दिन ही मिरे आ के उजालो पत्थर के सनम भी कभी कुछ बोल सके हैं ऐ बुत-शिकन अज़हान के ख़ामोश सवालो तुम में तो मिरा आहू-ए-ख़ुश-गाम नहीं है ऐ वादी-ए-तख़ईल के गुम-गश्ता ग़ज़ालो मिटती हुई तस्वीर में क्या रंग भरोगे मिटना था जिन्हें मिट गए तुम ख़ुद को सँभालो इक दर्द की दौलत तुम्हें हम सौंप चले हैं अब उस को लुटा दो कि हयात अपनी बना लो बाद-ए-सहरी फूल खिला आई चमन में कुछ तुम भी लहू अपने शहीदों का उछालो इन राहों में वो नक़्श-ए-कफ़-ए-पा तो नहीं है क्यूँँ फूट के रोए हो यहाँ पाँव के छालो चेहरे पे थकन बालों में गर्द आँखों में सुर्ख़ी लम्बा है सफ़र पाँव के काँटे तो निकालो फिर साअ'त-ए-दीदार 'वहीद' आए न आए तस्वीर बना कर उन्हें आँखों में छुपा लो — Waheed Akhtar
सफ़र ही बाद-ए-सफ़र है तो क्यूँँ न घर जाऊँ मिलें जो गुम-शुदा राहें तो लौट कर जाऊँ मुसलसल एक सी गर्दिश से है क़याम अच्छा ज़मीन ठहरे तो मैं भी कहीं ठहर जाऊँ समेटूँ ख़ुद को तो दुनिया को हाथ से छोड़ूँ असासा जमा करूँँ मैं तो ख़ुद बिखर जाऊँ है ख़ैर-ख़्वाहों की तल्क़ीन-ए-मस्लहत भी अजीब कि ज़िंदा रहने को मैं जीते-जी ही मर जाऊँ सबा के साथ मिला मुझ को हुक्म-ए-दर-ब-दरी गुलों की ज़िद है मिज़ाज उन का पूछ कर जाऊँ मिरी उड़ान अगर मुझ को नीचे आने दे तो आसमान की गहराई में उतर जाऊँ वो कह गया है करूँँ इंतिज़ार उम्र तमाम मैं उस को ढूँडने निकलूँ न अपने घर जाऊँ कहाँ उठाए फिरूँ बोझ अपने सर का 'वहीद' ये जिस का क़र्ज़ है उस के ही दर पे धर जाऊँ — Waheed Akhtar

Nazm

ज़ेहन जब तक है ख़यालात की ज़ंजीर कहाँ कटती है होंट जब तक हैं सवालात की ज़ंजीर कहाँ कटती है बहस करते रहो लिखते रहो नज़्में ग़ज़लें ज़ेहन पर सदियों से तारी है जो मज्लिस की फ़ज़ा इस ख़ुनुक आँच से क्या पिघलेगी सोच लेने ही से हालात की ज़ंजीर कहाँ कटती है नींद में डूबी हुई आँखों से वाबस्ता ख़्वाब तेज़ किरनों की सिनानों पे ही रुस्वा सर-ए-आम ये शहीद अपनी सलीबों से पलट आते हैं दिल में हर शाम सुब्ह होती है मगर रात की ज़ंजीर कहाँ कटती है दिन गुज़र जाता है बे-फ़ैज़ कद-ओ-काविश में एक अन-देखे जहन्नम की तब-ओ-ताबिश में जिस्म और जाँ की तग-ओ-ताज़ की हर पुर्सिश में दर्द-ओ-ग़म हसरत-ओ-महरूमी की हर काहिश में तलब-ओ-तर्क-ए-तलब सिलसिला-ए-बे-पायाँ मर्ग ही ज़ीस्त का उनवान है हर ख़ून-शुदा ख़्वाहिश में ग़म से भागें भी तो फ़र्याद-ओ-शिकायात की ज़ंजीर कहाँ कटती है वक़्त वो दौलत-ए-नायाब है आता नहीं हाथ हम मशीनों की तरह जीते हैं पाबंदी-ए-औक़ात के साथ वक़्त बे-कार गुज़रता ही चला जाता है कुर्सियों मेज़ों से बे-मा'नी मुलाक़ातों में सैंकड़ों बार की अगली हुई दोहराई हुई बातों में मंदगी रहने की तमन्ना की मुदारातों में शिकम-ओ-जाँ की इबादात की ज़ंजीर कहाँ कटती है सुब्ह से शाम तलक इतने ख़ुदा मिलते हैं हर काफ़िर को सज्दा-ए-शुक्र से इनकार की मोहलत नहीं मिलने पाती सैंकड़ों लाखों ख़ुदाओं की नज़र से छुप कर ख़ुद से मिल लेने की रुख़्सत नहीं मिलने पाती ख़ुद-परस्तों से भी ताआत की ज़ंजीर कहाँ कटती है रात आती है तो दिल कहता है हम अपने हैं ख़ल्वत-ए-ख़्वाब में दुनिया से किनारा कर लें कल भी देना है लहू अपना दिल-ओ-दीदा की झोली भर लें जिस्म के शोर से और रूह की फ़रियाद से दम घुटता है दिन के बे-कार ख़यालात की ज़ंजीर कहाँ कटती है बे-नियाज़ाना भी जीना है फ़क़त एक गुमाँ फ़िक्र-ए-मौजूद को छोड़ें तो ग़म-ए-ना-मौजूद साथ हर साँस के है सिलसिला-ए-हसत-ओ-बूद ग़म-ए-आफ़ाक़ को ठुकराएँ करें तर्क-ए-जहाँ फिर भी ये फ़िक्र कि जीने का हो कोई उनवाँ बे-नियाज़ी से ग़म-ए-ज़ात की ज़ंजीर कहाँ कटती है ज़ेहन में अंधे अक़ीदों की सियाही भर लो ताकि इस नगरी में कभी अफ़्कार के शो'लों का गुज़र हो न सके जब्र का हुक्म सुनो होंटों को अपने सी लो ताकि उन राहों से कभी लफ़्ज़ों का सफ़र हो न सके ज़ेहन-ओ-लब फिर भी नहीं चुप होते उन के ख़ामोश सवालात की पेच-दर-पेच ख़यालात की ज़ंजीर कहाँ कटती है — Waheed Akhtar
करम-ख़ुर्दा काग़ज़ों के ढेर में मदफ़ून है चाटता है हर्फ़ हर्फ़ दाएरे क़ौसैन सन तारीख़ आदाद ओ शुमार नुक़्ता ओ ज़ेर-ओ-ज़बर तश्दीद ओ मद हासिल-ए-बीनाई ओ ज़ौक़-ए-नज़र बाँधता है वहम ओ तख़मीन ओ गुमाँ के कुछ हिसार चूमता है कतबा-ए-लौह-ए-मज़ार चंद नुक़्ते उड़ गए हैं लफ़्ज़ कुछ कावाक हैं उस की नज़रों में ख़ज़ीना इल्म का ख़ार ओ ख़स-ओ-ख़ाशाक हैं क्या अलाएम क्या रुमूज़ 'इश्क़ाल अल्फ़ाज़ ओ हुरूफ़ आतिश-ए-तग़ईर के हाथों पिघल जाते हैं सब वक़्त की भट्टी में तप कर इक नए साँचे में ढल जाते हैं सब लम्हा लम्हा मुन्कशिफ़ होता हुआ सर-ए-हयात मुंजमिद अल्फ़ाज़ के सीने में अपना नूर फैलाता नहीं करम-ख़ुर्दा काग़ज़ों की लाश में ख़ूँ अपना दौड़ाता नहीं करम-काग़ज़ है हरीफ़-ए-रोज़-ओ-शब चाटता है फ़ुज़्ल-ए-इल्म-ओ-अदब और सर अकड़ाए ख़ल्लाक़ान-ए-मअ'नी की तरफ़ ख़ंदा-ब-लब — Waheed Akhtar
ऐ ख़ुदा ऐ ख़ुदा मैं हूँ मसरूफ़-ए-तस्बीह-ओ-हम्द-ओ-सना गो ब-ज़ाहिर इबादत की आदत नहीं है रिंद-मशरब हूँ ज़ोहद-ओ-रियाज़त से रग़बत नहीं है मगर जब भी चलता है मेरा क़लम जब भी खुलती है मेरी ज़बाँ कुछ कहूँ कुछ लिखूँ तेरी तख़्लीक़ का ज़मज़मा मुद्दआ' मुंतहा हर्फ़ जुड़ कर बनें लफ़्ज़ तो करते हैं तेरी हम्द-ओ-सना या ख़ुदा या ख़ुदा मेरे अतराफ़ हैं पेट ख़ाली बदन-ए-नीम-जाँ कोई तकता है जब मेरा दस्त-ए-तही शर्म आती है मुझ को ख़ुदा-ए-ग़नी सोचता हूँ मैं अपनी ज़बाँ रेहन रख दूँ कहीं रिज़्क़ से ख़ाली पेटों को भर दूँ जो हैं नीम-जाँ उन में जान फूँक दूँ और अपने लिए थोड़ी आसाइशें मोल ले आऊँ बाज़ार से अपने बच्चों की ज़िद पूरी कर दूँ जो वाक़िफ़ नहीं हैं मईशत के अंदाज़-ओ-रफ़्तार से फिर यही सोचता हूँ ख़ुदा ऐ ख़ुदा क्या ज़बाँ रेहन हो कर भी तेरी इता'अत करेगी क्या क़लम बिक के भी नाम तेरा ही लेगा दूसरों को ख़ुदा मान कर वो न करने लगें मा-सिवा की भी हम्द-ओ-सना ऐ ख़ुदा ऐ ख़ुदा है दुआ आख़िरी साँस तक ये क़लम ये ज़बाँ लिखते रहते हैं ला-इलाहा — Waheed Akhtar
चेहरे रूहों की बे-माएगी ज़ेहन की तीरगी के सियह आइने सर्द आँखों के तारीक रौज़न में दुबका हुआ इक ख़ला एक सन्नाटा होंटों के बस्ता मकाँ में है सोया हुआ रूह को जेहद-ए-तहसील-ए-ज़र खा गई ज़ेहन की रौशनी ना-उम्मीदी की ज़ुल्मत में धुँदला गई आँखें नाकामियों के खंडर में मकाँ के तसव्वुर से आरी हुईं होंट कश्कोल दरयूज़ा-गर बन के लफ़्ज़ों के इस्मत की दूकाँ बने और अब कुछ नहीं और अब कुछ नहीं एक दीवाना गर ख़्वाहिश-ए-ज़ीस्त है ख़ाल-ओ-ख़त दस्त-ओ-पा सीना-ओ-सर शिकम और ज़ेर-ए-शिकम एक दीवाना गर ख़्वाहिश-ए-ज़ीस्त आ'ज़ा में दौड़ी हुई एक बे-मअ'नी बेकार अपाहिज हवस-ए-जिस्म के ताने-बाने को था में हुए सिर्फ़ उस एक लम्हे की आमद का है इंतिज़ार जब कि ज़ेहनों के रूहों के आइने आँखों में दुबका ख़त और होंटों से लिपटा सुकूत एक बार ख़्वाहिश-ए-ज़ीस्त से कह सकें ज़ीस्त हम पर हमेशा से इल्ज़ाम है हम न ज़िंदा रहे हैं कभी और न ज़िंदा हैं अब एक दीवाना-गर ख़्वाहिश-ए-मर्ग ही थी हमारे लिए ज़िंदगी — Waheed Akhtar
मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा ज़िंदगी के हसीन गीत गाता रहा उस की आवाज़ पर अंजुमन झूम उट्ठी उस ने जब ज़ख़्म-ए-दिल को ज़बाँ बख़्श दी सुनने वालों ने बे-साख़्ता आह की इश्क़ के साज़ पर जब हुआ ज़ख़्मा-ज़न शोर-ए-तहसीं में ख़ुद उस की आवाज़ दब सी गई मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा फिर भी तन्हा रहा तिश्नगी-ए-मशाम उस को बाद-ए-सबा की तरह गुल-ब-गुल ले गई कासा-ए-चश्म ने परतव-ए-गुल भी पाया नहीं दर्द उस का किसी महरम-ए-दर्द के वास्ते दर-ब-दर शहर-दर-शहर फिरता रहा दाद ओ तहसीं के हंगामा-ए-ज़ौक़-कश में उसे हर तरफ़ से मलामत के पत्थर मिले मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा पत्थरों से पटकता रहा अपना सर पत्थरों को ज़बाँ तो मिली पर तकल्लुम नहीं पत्थरों को ख़द-ओ-ख़ाल-ए-इंसाँ मिले दौलत-ए-दर्द-ओ-ग़म कब मिली पत्थरों को हसीं सूरतें तो मिलीं दिल नहीं मिल सका पत्थरों को मिले पाँव पर ए'तिमाद-ए-सफ़र कौन दे पत्थरों को मिले हाथ पर अज़्म-ए-तेशा-ज़नी कौन दे संग सुनते हैं लेकिन समझते नहीं देखते हैं मगर फ़र्क़ करते नहीं बात करते हैं महसूस करते नहीं टूट सकते हैं लेकिन पिघलते नहीं गर्द बन कर ये उड़ जाएँ साँचों में ढलते नहीं मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा पत्थरों से पटकता रहा अपना सर मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा पत्थरों को सुनाता रहा दर्द-ए-दिल अपना ग़म उन का ग़म सब का ग़म पत्थरों ने सुना और चुप-चाप हँसते रहे पत्थरों की इसी अंजुमन का मुग़न्नी हूँ मैं और बे-दर्द बे-हिस सितमगार पत्थर सुनेंगे कभी उन का वो मुतरिब-ए-ख़ुश-नवा शिकवा-संज-ए-ज़माँ अपने नग़्मात की आग में जल गया फिर उन ही के मानिंद पत्थर का बुत बन गया — Waheed Akhtar
अगर मैं कहता हूँ जीना है क़ैद-ए-तन्हाई तो ज़िंदगानी की क़ीमत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर न आया मुझे साज़गार वस्ल-ए-हबीब तो ए'तिमाद-ए-मोहब्बत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर मिले मुझे विर्से में कुछ शिकस्ता खंडर तो काएनात की वुसअत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर दिखाई दिए मुझ को आदमी आसेब तो अस्र-ए-नौ की बसीरत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर न राह-ए-यक़ीं पा सकी मिरी तश्कीक तो फ़िक्र-ओ-फ़न की शराफ़त पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर ख़िज़ाँ ही मिली मुझ को आँख खुलने पर तो फ़स्ल-ए-गुल की अमानत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर मिरे ग़म-ए-बे-नाम को मिली वहशत तो बज़्म-ए-जश्न-ए-मसर्रत पे हर्फ़ क्यूँँ आए मैं अपने अहद का हूँ नौहा-ख़्वाँ न दीजे दाद क़सीदा-ख़्वाँ की रिवायत पे हर्फ़ क्यूँँ आए अगर हुनर है मिरा जिंस-ए-कम-अयार तो हो ज़मीर-ओ-दिल की तिजारत पे हर्फ़ क्यूँँ आए मैं अपने ख़्वाबों का भटका हुआ मुसाफ़िर हूँ अगर मुझे न मिली मंज़िल-ए-नजात तो क्या मैं अपनी रूह की तन्हाइयों का शोअ'ला हूँ हवा-ए-दहर में हासिल नहीं सबात तो क्या मैं अपनी तुर्फ़गी-ए-तब्अ' का तो पी लूँ ज़हर जो दस्तरस में नहीं चश्मा-ए-हयात तो क्या मैं अपनी ज़ात की ख़ल्वत का हैरती ही सही जो मुझ पे खुल न सका राज़-ए-काएनात तो क्या मैं अपने ख़ूँ के चराग़ों को रौशनी दे दूँ सहर-नसीब न हो पाए मेरी रात तो क्या मैं आप से न कहूँगा कि है ज़ियाँ जाँ का ख़याल-ए-शीशा-ए-दिल संग-आज़मा न करे मैं आप से नहीं चाहूँगा दाद-ए-जाँ-बाज़ी दुआ है आप को ग़म दर्द-आश्ना न करे मैं आप से नहीं माँगूँगा ख़ूँ-बहा-ए-वफ़ा कोई तो तर्क रह-ओ-रस्म-ए-आशिक़ाना करे मैं आप को न दिखाऊँगा अपने ज़ख़्मी ख़्वाब ख़लल हो आप के आराम में ख़ुदा न करे मगर ज़मीन परोमीथियस को क्यूँँ रोके जो वो जहाँ के ख़ुदाओं से जंग करता है उसे न मौत के आसेब पास आने दें जो आसमानों से ले कर हयात उतरता है है डर पिघलने का देखें इधर न बर्फ़ के बुत जो कोई शोला-ए-उर्यां ये हाथ धरता है अज़ाब उस पे करें कम न क़हर के देवता जो अपनी आग में जल कर भी रक़्स करता है इसे न माने कभी बे-हिसी हयात-परस्त हर एक साँस पे जो ज़िंदा हो के मरता है करें न आप मुदावा-ए-सोज़-ए-आतिश-ए-ग़म ये ज़ुल्म मुझ पे तो हर रोज़-ओ-शब गुज़रता है सलामत आप का ईमान मैं तो हूँ काफ़िर हर एक वज़्अ'' से अपनी हयात करता है — Waheed Akhtar
ये भी तिलिस्म-ए-होश-रुबा है ज़िंदा चलते-फिरते हँसते रोते नफ़रत और मोहब्बत करते इंसाँ सिर्फ़ हयूले और धुवें के मर्ग़ूले हैं हम सब अपनी अपनी लाशें अपने तवहहुम के काँधों पर लादे सुस्त-क़दम वामाँदा ख़ाक-ब-सर दामान-ए-दरीदा ज़ख़्मी पैरों से काँटों अंगारों पर चलते रहते हैं हम सब एक बड़े क़ब्रिस्ताँ के आवारा भूत हैं जिन के जिस्म तो हाथ लगाने से तहलील ख़ला में हों जिन की रूहों का ज़ाहिर से ज़ाहिर गोशा हाथ न आए हम को माज़ी से विर्से में कोहना क़ब्रें, गिरते मलबे और आसेब-ज़दा खंडरों के ढेर मिले हैं वो रौशन शब-ताब दिए जिन से माज़ी को नूर मिला था इस आसेब-ज़दा माहौल में यूँँ जुलते हैं जैसे इक पुर-हौल बयाबाँ के तीरा सन्नाटे में कुछ भूतों ने रह-गुम-कर्दा सय्याहों को भटकाने की ख़ातिर आग जलाई हो अब ये उजाले सिर्फ़ धुआँ हैं और आसेब-ज़दा खंडरों की छत के चटख़्ते शहतीरों के शोर में कोई हँसता है झड़ता चूना गिरती मिट्टी नीम मुअल्लक़ दीवार-ओ-दर चुपके चुपके रोते हैं ताक़ों के ख़ामोश दिए ज़ुल्मत को बढ़ावा देते हैं सहन के सदहा साल पुराने बूढ़े पेड़ क़ब्रों के बे-दर्द मुजावर बन कर लाशों पर सूखे पत्तों के ढेर लगा देते हैं हम सब अपनी अपनी लाशें अपने अना के दोश पे लादे इक क़ब्रिस्ताँ की पुर-हौल उदासी से उकताए हुए एक नए शमशान का रस्ता ढूँड रहे हैं मुंतज़िर-ए-मर्ग-ए-अम्बोह हुजूम आँखों के ख़ाली कासे खोले हर-सू देख रहा है जाने कब कोई आएगा जो अपने दामन की हवा से भूतों का जलना देखेगा और भयानक साए गले मिल मिल कर खोखली आवाज़ों में रोएँगे इस मंज़र में जाने फिर ऐसा कोई आए कि न आए हज्व वीराँ मायूस निगाहों की ख़ाली झोली फैलाए राख में फूल कुरेदेगा — Waheed Akhtar
आ'ज़ा का तनासुब रगों में दौड़ते ज़िंदा जवाँ सरशार ख़ूँ की गुनगुनाहट हमें देते हैं दावत इश्क़ की लेकिन हमारी चश्म-ए-आहन-पोश पैराहन-शनासा है लिबासों की मोहब्बत वज़्-ए-पैराहन को सब कुछ मान कर ना-बीना आँखें इश्क़ करती हैं हमारी ज़िंदगी तहज़ीब-ए-पैराहन है ज़ाहिर की परस्तिश है हमारे सारे आदाब-ए-नज़ारा फ़र्ज़ कर लेते हैं इंसाँ बे-बदन है बदन दर-अस्ल इंसाँ है तमद्दुन है मोहब्बत है बदन ही रूह है नूर-ए-हरारत ज़िंदगी है बदन ही का करिश्मा ज़ेहन की तख़्लीक़ तस्ख़ीर-ए-फुलाँ है हमारी चश्म-ए-आहन-पोश पैराहन शनासा है बदन की ताब ला सकती नहीं तहज़ीब-ए-पैराहन न ज़िंदा है न ज़ेहन-ओ-रूह रखती है हमारे बूढ़े कोहना और फ़र्सूदा लिबासों से इबारत हैं हमारे नौजवाँ मग़रिब के ताज़ा फैशनों के चलते फिरते इश्तिहारी हैं बदन मादूम है और बे-बदन रूहें धुआँ हैं बे-बदन अज़हान आसेब-ए-नज़ारा हैं — Waheed Akhtar