Waheed Akhtar

Waheed Akhtar

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Waheed Akhtar shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Waheed Akhtar's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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तुम गए साथ उजालों का भी झूटा ठहरा
रोज़-ओ-शब अपना मुक़द्दर ही अँधेरा ठहरा

याद करते नहीं इतना तो दिल-ए-ख़ाना-ख़राब
भूला-भटका कोई दो रोज़ अगर आ ठहरा

कोई इल्ज़ाम नसीम-ए-सहरी पर न गया
फूल हँसने पे ख़तावार अकेला ठहरा

पत्तियाँ रह गईं बू ले उड़ी आवारा सबा
क़ाफ़िला मौज-ए-बहाराँ का बस इतना ठहरा

रोज़ नज़रों से गुज़रते हैं हज़ारों चेहरे
सामने दिल के मगर एक ही चेहरा ठहरा

वक़्त भी सई-ए-मदावा-ए-अलम कर न सका
जब से तुम बिछड़े हो ख़ुद वक़्त है ठहरा ठहरा

दिल है वो मोम मिला है जिसे शम्ओं' का गुदाज़
अब कोई देखे न देखे यूँही जलना ठहरा

तुम ने जो शम्अ' जलाई थी न बुझने पाए
अब तो ले-दे के यही काम हमारा ठहरा

गुनगुना लेंगे ग़ज़ल आज 'वहीद'-अख़्तर की
नाम लेना ही जो दर-पर्दा तुम्हारा ठहरा
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Waheed Akhtar
तेरी गली में जो मिला उस से पता पूछा तिरा
सब तुझ से थे ना-आश्ना पर सब में था शोहरा तिरा

कोई न था जब आश्ना हम ने किया चर्चा तिरा
ऐ हर किसी के आश्ना अब हम से क्या रिश्ता तिरा

तू जब हुआ पीर-ए-मुग़ाँ थे सब ही तेरे मद्ह-ख़्वाँ
रह कर ख़मोश ऐ ख़ुद-निगर हम ने भरम रक्खा तिरा

उन से तअ'ल्लुक़ क़त्अ कर जिन से हुआ तू मो'तबर
रख ना-शनासों पर नज़र रह जाएगा पर्दा तिरा

औरों के नक़्श-ए-पा पे हम किस तरह से रखते क़दम
लाखों नुक़ूश-ए-पा से था छलका हुआ जादा तिरा

तू कर उन्ही पर सख़्तियाँ रौशन है जिन से तेरी जाँ
उन पर ही तू रह मेहरबाँ करते हैं जो सौदा तिरा

बरसों से हैं दीदा-वराँ तेरी गली में सरगिराँ
सब कुछ धरा रह जाएगा चल दे जो बंजारा तिरा

है ये हमारा ही लहू अब तक रहा तू सुर्ख़-रू
हम दें न जिस दिन ख़ूँ-बहा बुझ जाएगा चेहरा तिरा

ऐ शहर-ए-मर्दुम-ना-शनास ऐ बज़्म-ए-फ़न-ना-आशना
सन्नाटे बोलेंगे यहाँ छोड़ें जो हम कूचा तिरा

तू मुनफ़रिद आलम से है ये सब हमारे दम से है
मुल्क-ए-सुख़न में हम से ही गूँजा हुआ नग़्मा तिरा

हो जब तिरा क़िस्सा रक़म और रोक लें इक हम क़लम
किस ज़िक्र किस उन्वान से फिर नाम आएगा तिरा
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Waheed Akhtar
सहराओं में दरिया भी सफ़र भूल गया है
मिट्टी ने समुंदर का लहू चूस लिया है

दुनिया की मलामत का भी अब ख़ौफ़ है दिल को
ख़ाशाक ने मौजों को गिरफ़्तार किया है

मंज़िल है न जादा है न साया है न पानी
तन्हाई का एहसास फ़क़त राह-नुमा है

सूरज भी पड़ा रोता है इक गहरे कुएँ में
बरसों हुए आकाश भी धुँदलाया हुआ है

बिछड़े हुए ख़्वाब आ के पकड़ लेते हैं दामन
हर रास्ता परछाइयों ने रोक लिया है

किरनों से तराशा हुआ इक नूर का पैकर
शरमाया हुआ ख़्वाब की चौखट पे खड़ा है

फूलों से लदी टहनियाँ फैलाए हैं बाँहें
ख़ुश्बू का बदन ख़ाक में पामाल पड़ा है

दीवार-ओ-दर-ए-शहर पे हैं ख़ून के धब्बे
रंगों का हसीं क़ाफ़िला सहरा में लुटा है
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Waheed Akhtar
हम जो टूटे तो ग़म-ए-दहर का पैमाना बने
ख़ाक में मिल के भी ख़ाक-ए-रह-ए-मय-खाना बने

कौन इस बज़्म में समझेगा ग़म-ए-दिल की ज़बाँ
बात छोटी सी जब अफ़्साना-दर-अफ़्साना बने

संग-अंदाज़ों से ऊँचा है बहुत अपना मक़ाम
वर्ना मुमकिन था निशाना सर-ए-दीवाना बने

शहर-ए-जानाँ से भी हम लाए मोहब्बत का ख़िराज
क्या ज़रूरी है कि याँ वज़-ए-गदायाना बने

वहशत आमादा-ए-रुसवाई है बे-ख़ौफ़ जहाँ
ज़ब्त का है ये तक़ाज़ा कि तमाशा न बने

ज़िंदगी हम तिरे इतने तो ख़ता-वार न थे
कि जिसे अपना बनाएँ वही बेगाना बने

इक तमन्ना कोई ऐसा तो बड़ा जुर्म न थी
आँख ता-मर्ग छलकता हुआ पैमाना बने

क्या रिफ़ाक़त है यही ऐ दिल-ए-आशुफ़्ता-मिज़ाज
देख हम एक तिरे वास्ते क्या क्या न बने

अजनबी लगते हैं हम अपनी नज़र को ख़ुद ही
आप अपने से न इतना कोई बेगाना बने

हम पे इक उम्र से तारी है ख़मोशी ऐसी
एक नक़्शे पे सिमट जाए तो अफ़्साना बने

ऐ मिरे हौसला-ए-ग़म है यही वक़्त-ए-वफ़ा
ज़हर ही हासिल-ए-सद-उम्र-ए-तमन्ना न बने

ज़िंदगी करने के अंदाज़ तो भूलो न 'वहीद'
तुम ने क्या सीखा अगर इश्क़ सलीक़ा न बने
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Waheed Akhtar
रुख़्सत-ए-नुत्क़ ज़बानों को रिया क्या देगी
दर्स हक़-गोई का ये बिंत-ए-ख़ता क्या देगी

सज्दा करती है लईमों के दरों पर दुनिया
बे-नियाज़ों को ये बे-शर्म भला क्या देगी

यही होगा कि न आएगी कभी घर मेरे
मुझ को दुनिया-ए-दुनी और सज़ा क्या देगी

साल-हा-साल के तूफ़ाँ में भी दिल बुझ न सका
ज़क उसे सरकशी-ए-मौज-ए-हवा क्या देगी

कोई मौसम हो महकते हैं यहाँ ज़ख़्म के फूल
मेरे दामन को तही-दस्त सबा क्या देगी

दिल तो कुछ कहता है पर शर्म से उठते नहीं हाथ
देखना है कि ये बे-दस्त दुआ क्या देगी

ख़्वाहिश-ए-मर्ग है कुछ पाने की मौहूम उम्मीद
ज़िंदगी दे न सकी कुछ तो क़ज़ा क्या देगी

ख़्वाब देखे हैं तो बेदार रहो उम्र तमाम
चश्म-ए-ख़्वाबीदा को ताबीर-ए-सिला क्या देगी

इसी ज़िंदान में अब काट दो उम्र अपनी 'वहीद'
मैं न कहता था तुम्हें क़ैद-ए-वफ़ा क्या देगी
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Waheed Akhtar
दीवानों को मंज़िल का पता याद नहीं है
जब से तिरा नक़्श-ए-कफ़-ए-पा याद नहीं है

अफ़्सुर्दगी-ए-इश्क़ के खुलते नहीं अस्बाब
क्या बात भुला बैठे हैं क्या याद नहीं है

हम दिल-ज़दगाँ जीते हैं यादों के सहारे
हाँ मिट गए जिस पर वो अदा याद नहीं है

घर अपना तो भूली ही थी आशुफ़्तगी-ए-दिल
ख़ुद-रफ़्ता को अब दर भी तिरा याद नहीं है

लेते हैं तिरा नाम ही यूँ जागते सोते
जैसे कि हमें अपना ख़ुदा याद नहीं है

ये एक ही एहसान-ए-ग़म दोस्त है क्या कम
बे-मेहरी-ए-दौराँ की जफ़ा याद नहीं है

बे-बरसे गुज़र जाते हैं उमडे हुए बादल
जैसे उन्हें मेरा ही पता याद नहीं है

इस बार 'वहीद' आप की आँखें नहीं बरसीं
क्या झूमती ज़ुल्फ़ों की घटा याद नहीं है
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Waheed Akhtar
आग अपने ही दामन की ज़रा पहले बुझा लो
फ़ुर्सत हो तो फिर हम को भी जलने से बचा लो

ऐ क़िस्मत-ए-फ़र्दा के ख़ुश-आइंद ख़यालो
रातें न सही दिन ही मिरे आ के उजालो

पत्थर के सनम भी कभी कुछ बोल सके हैं
ऐ बुत-शिकन अज़हान के ख़ामोश सवालो

तुम में तो मिरा आहू-ए-ख़ुश-गाम नहीं है
ऐ वादी-ए-तख़ईल के गुम-गश्ता ग़ज़ालो

मिटती हुई तस्वीर में क्या रंग भरोगे
मिटना था जिन्हें मिट गए तुम ख़ुद को सँभालो

इक दर्द की दौलत तुम्हें हम सौंप चले हैं
अब उस को लुटा दो कि हयात अपनी बना लो

बाद-ए-सहरी फूल खिला आई चमन में
कुछ तुम भी लहू अपने शहीदों का उछालो

इन राहों में वो नक़्श-ए-कफ़-ए-पा तो नहीं है
क्यूँ फूट के रोए हो यहाँ पाँव के छालो

चेहरे पे थकन बालों में गर्द आँखों में सुर्ख़ी
लम्बा है सफ़र पाँव के काँटे तो निकालो

फिर साअ'त-ए-दीदार 'वहीद' आए न आए
तस्वीर बना कर उन्हें आँखों में छुपा लो
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Waheed Akhtar
आँख जो नम हो वही दीदा-ए-तर मेरा है
मौज-ए-ग़म उट्ठे कहीं उस का गुहर मेरा है

देख लूँ मैं तो सितारे हैं न देखूँ तो धुआँ
क्या रसा इतना कफ़-ए-दस्त-ए-नज़र मेरा है

समर ओ गुल हैं गुलिस्तान-फ़रोशों के लिए
आबयारी के लिए ख़ून-ए-जिगर मेरा है

क़स्र हो या कि लहद दोनों किरायें के मकाँ
रोज़ कहता है कोई आ के ये घर मेरा है

दश्त की उड़ती हुई रेत पे लिख देते हैं लोग
ये ज़मीं मेरी ये दीवार ये दर मेरा है

इस शर-आबाद ख़राबे में कहाँ हुस्न-ओ-जमाल
हुस्न जितना भी है सब हुस्न-ए-नज़र मेरा है

मौत है जुरअत-ए-इज़हार की पज़मुर्दा-लबी
साज़-ए-तख़लीक़ लब-ए-अर्ज़-ए-हुनर मेरा है

वो ख़ुदा हो तो हो मैं ढूँडने क्यूँ जाऊँ उसे
ख़ुद ही अपना ले मुझे बढ़ के वो गर मेरा है

कट के सर पढ़ते हैं नेज़ों पे भी क़ुरआन 'वहीद'
जुज़्व-ए-तन रह के भी चुप किस लिए सर मेरा है
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Waheed Akhtar
कहीं शुनवाई नहीं हुस्न की महफ़िल के ख़िलाफ़
गुल न क्यूँ हँसते रहें शोर-ए-अनादिल के ख़िलाफ़

जान-ओ-ईमाँ भी वही दुश्मन-ए-जान-ओ-ईमाँ
हम गवाही भी न देंगे कहीं क़ातिल के ख़िलाफ़

किसी जादे पे चलो छोड़ेगी तन्हाई न साथ
क़दम उट्ठें तो किधर इश्क़ की मंज़िल के ख़िलाफ़

बज़्म-ए-याराँ हो कि मय नग़्मा के फ़ैज़ान-ए-सुख़न
सब हैं साज़िश में शरीक उस की मिरे दिल के ख़िलाफ़

हिज्र में जी के बहलने के थे जितने हीले
वहशत इक साथ रही हो गए सब मिल के ख़िलाफ़

इसी आग़ोश में दम तोड़ेंगी आ कर मौजें
भागती फिरती हैं बेकार ही साहिल के ख़िलाफ़

अक़्ल-ए-दुनिया का तुम्हें दा'वा है बे-वज्ह 'वहीद'
दो-क़दम चल नहीं सकते कभी तुम दिल के ख़िलाफ़
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Waheed Akhtar
रहे वो ज़िक्र जो लब-हा-ए-आतिशीं से चले
चले वो दूर जो रफ़्तार-ए-सात्गीं से चले

हज़ारों साल सफ़र कर के फिर वहीं पहुँचे
बहुत ज़माना हुआ था हमें ज़मीं से चले

ख़िरद बनी रही ज़ंजीर-ऐ-पा-ऐ-शौक़ मगर
जुनूँ के जितने भी हैं सिलसिले हमीं से चले

फ़ुरात जीत के भी तिश्ना-लब रही ग़ैरत
हज़ार तीर-ए-सितम ज़ुल्म की कमीं से चले

ज़माना एक ही रस्ते पे ला के छोड़ेगा
रवाँ है एक ही धारा कोई कहीं से चले

गुमान-ओ-शक के दो-राहे पे हम से आ के मिले
वो क़ाफ़िले जो किसी मंज़िल-ए-यक़ीं से चले

हमें शिकस्त-ए-हरीफ़ां का भी मलाल रहा
शिकस्ता-दिल जो हम उस बज़्म-ए-दिल-नशीं से चले

तमाम गुमरहियाँ दैर और हरम में पलीं
तमाम सिलसिला-ए-कुफ़्र अहल-ए-दीं से चले

'वहीद' सैल-ए-क़यामत ने राह रोकी थी
जो बन के अश्क हम उस चश्म-ऐ-नाज़नीनीं से चले
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Waheed Akhtar
ख़ुश्बू है कभी गुल है कभी शम्अ कभी है
वो आतिश-ए-सय्याल जो सीने में भरी है

बादा-तलबी शौक़ की दरयूज़ा-गरी है
सद-शुक्र कि तक़दीर ही याँ तिश्ना-लबी है

ग़ुंचों के चटकने का समाँ दिल में अभी है
मिलने में जो उठ उठ के नज़र उन की झुकी है

अब ज़ब्त से कह दे कि ये रुख़्सत की घड़ी है
ऐ वहशत-ए-ग़म देर से क्या सोच रही है

मासूम है याद उन की भटक जाए न रस्ता
ख़ूँ-गश्ता तमन्नाओं की क्यूँ भीड़ लगी है

यादों से कहो सोला-सिंगार आज कराएँ
आईना-ब-कफ़ हसरत-ए-दीदार खड़ी है

लब सी लिए अंदेशा-ए-दुश्नाम-ए-जहाँ से
अब अपनी ख़मोशी ही इक अफ़्साना बनी है

ठहरी है तो इक चेहरे पे ठहरी रही बरसों
भटकी है तो फिर आँख भटकती ही रही है
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Waheed Akhtar
अँधेरा इतना नहीं है कि कुछ दिखाई न दे
सुकूत ऐसा नहीं है जो कुछ सुनाई न दे

जो सुनना चाहो तो बोल उट्ठेंगे अँधेरे भी
न सुनना चाहो तो दिल की सदा सुनाई न दे

जो देखना हो तो आईना-ख़ाना है ये सुकूत
हो आँख बंद तो इक नक़्श भी दिखाई न दे

ये रूहें इस लिए चेहरों से ख़ुद को ढाँपे हैं
मिले ज़मीर तो इल्ज़ाम-ए-बेवफ़ाई न दे

कुछ ऐसे लोग भी तन्हा हुजूम में हैं छुपे
कि ज़िंदगी उन्हें पहचान कर दुहाई न दे

हूँ अपने-आप से भी अजनबी ज़माने के साथ
अब इतनी सख़्त सज़ा दिल की आश्नाई न दे

सभी के ज़ेहन हैं मक़रूज़ क्या क़दीम ओ जदीद
ख़ुद अपना नक़्द-ए-दिल-ओ-जां कहीं दिखाई न दे

बहुत है फ़ुर्सत-ए-दीवानगी की हसरत भी
'वहीद' वक़्त गर इज़्न-ए-ग़ज़ल-सराई न दे
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Waheed Akhtar
जिस को माना था ख़ुदा ख़ाक का पैकर निकला
हाथ आया जो यक़ीं वहम सरासर निकला

इक सफ़र दश्त-ए-ख़राबी से सराबों तक है
आँख खोली तो जहाँ ख़्वाब का मंज़र निकला

कल जहाँ ज़ुल्म ने काटी थीं सरों की फ़सलें
नम हुई है तो उसी ख़ाक से लश्कर निकला

ख़ुश्क आँखों से उठी मौज तो दुनिया डूबी
हम जिसे समझे थे सहरा वो समुंदर निकला

ज़ेर-ए-पा अब न ज़मीं है न फ़लक है सर पर
सैल-ए-तख़्लीक़ भी गिर्दाब का मंज़र निकला

गुम हैं जिबरील ओ नबी गुम हैं किताब ओ ईमाँ
आसमाँ ख़ुद भी ख़लाओं का समुंदर निकला

अर्श पर आज उतरती है ज़मीनों की वही
कुर्रा-ए-ख़ाक सितारों से मुनव्वर निकला

हर पयम्बर से सहीफ़े का तक़ाज़ा न हुआ
हक़ का ये क़र्ज़ भी निकला तो हमीं पर निकला

गूँज उठा नग़्मा-ए-कुन दश्त-ए-तमन्ना में 'वहीद'
पा-ए-वहशत हद-ए-इम्काँ से जो बाहर निकला
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