Meaning of

ज़मीर

zameer • ضمیر

अंतरात्मा; आंतरिक आवाज़; नैतिक भावना

conscience; inner voice; moral sense

ضمیر; اندرونی آواز; اخلاقی حس

Arabic

दौर था कोई ज़मीर-ओ-वर्द का इंसानियत का
वर्द अब सब लोभ के हैं मश्ग़ला क्या झूठ क्या सच

मसअला क़ैद-ए-हवस का और मसाइल जिस्म के हों
फिर भला क्या हासिल-ए-इश्क़-ओ-वफ़ा क्या झूठ क्या सच

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मैं मारा जाऊँगा पहले किसी फ़साने में
फिर इस के ब'अद हक़ीक़त में मारा जाऊँगा

मैं चुप रहा तो मुझे मार देगा मेरा ज़मीर
गवाही दी तो अदालत में मारा जाऊँगा

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हमें पता है कि मसरूफ़ हो बहुत फिर भी
हमारी दस्तकें सुनते रहो ज़मीर हैं हम

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वो जंग जिस में मुक़ाबिल रहे ज़मीर मिरा
मुझे वो जीत भी 'अंबर' न होगी हार से कम

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अब हम भी सोचते हैं कि बाज़ार गर्म है
अपना ज़मीर बेच के दुनिया ख़रीद लें

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नसीब लिखने वालें ने क्या कमाल लिखा है
ज़मीर पे मेरे धब्बा उसे रुमाल लिखा है

मुरीद हूँ मैं शिक्षा का मज़ीद ज्ञान नहीं है
जवाब मुश्किल हो ऐसा उसे सवाल लिखा है

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इंसाँ के ज़मीरों को जला देती है ग़ुर्बत
कुछ बात है दर उस का अँधेरे में खुला है

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फ़ाएदा नहीं कोई जा के बड़बड़ाने में
जब ज़मीर बिक जाए अफ़सरों का थाने में

पलने वाला टुकड़ों पर ख़ुद को शे'र कहता है
ज़िंदगी गुज़ारी है जिस ने दुम हिलाने में

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धोखाधड़ी अजीब किए जा रहा बशर
लाखों की बददुआएँ लिए जा रहा बशर

दौलत की चकाचौंध में गिरवी रखा ज़मीर
ईमाँ को बेचकर भी जिए जा रहा बशर

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इस तरह ज़िंदगानी को गुलज़ार कीजिए
सब रंजिशे भुलाइए और प्यार कीजिए

पैग़ाम दे रही है ये तारीख़-ए-करबला
सोए हुए ज़मीर को बेदार कीजिए

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दौर था कोई ज़मीर-ओ-वर्द का इंसानियत का
वर्द अब सब लोभ के हैं मश्ग़ला क्या झूठ क्या सच

मसअला क़ैद-ए-हवस का और मसाइल जिस्म के हों
फिर भला क्या हासिल-ए-इश्क़-ओ-वफ़ा क्या झूठ क्या सच

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मैं मारा जाऊँगा पहले किसी फ़साने में
फिर इस के ब'अद हक़ीक़त में मारा जाऊँगा

मैं चुप रहा तो मुझे मार देगा मेरा ज़मीर
गवाही दी तो अदालत में मारा जाऊँगा

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ज़मीर भीतर का मौन मार्गदर्शक है, नैतिक दिशा सूचक जो किसी के कार्यों को निर्देशित करता है। यह तर्क और नैतिकता की आवाज़ है, जिसे अक्सर एक फुसफुसाहट के रूप में चित्रित किया जाता है जो आत्मा को चुनौती देती है या सांत्वना देती है।

कवि 'ज़मीर' का उपयोग अपराधबोध, मोचन, और नैतिक संघर्ष के विषयों का अन्वेषण करने के लिए करते हैं। यह अक्सर एक कथा में मौन न्यायाधीश होता है, बाहरी निर्णयों के विपरीत और व्यक्तिगत अखंडता को उजागर करता है।

काव्यिक क्षेत्र में, 'ज़मीर' आत्मा का शांत मध्यस्थ है, धर्म के लिए निरंतर संघर्ष का प्रमाण है।