दौर था कोई ज़मीर-ओ-वर्द का इंसानियत कावर्द अब सब लोभ के हैं मश्ग़ला क्या झूठ क्या सचमसअला क़ैद-ए-हवस का और मसाइल जिस्म के होंफिर भला क्या हासिल-ए-इश्क़-ओ-वफ़ा क्या झूठ क्या सच— Karal 'Maahi'