Meaning of

बे-ख़ौफ़

be-KHauf • بے خوف

निर्भीक; साहसी

fearless; bold

بے خوف; دلیر

Persian

बे-ख़ौफ़ बे-शुमार मिरे यार बाँटिए
नफ़रत नहीं जहाँ में फ़क़त प्यार बाँटिए

गुल दे के उन को कीजिए उन की मुख़ालिफ़त
जो लोग कह रहे हैं शजर ख़ार बाँटिए

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क्या क्या गुमाँ न थे हमें दीवार-ओ-दर के बीच
ऊँचाइयों पे जा के ख़लाओं से डर गए

मज
में' में कर रहे थे जो बे-ख़ौफ़ियों की बात
तन्हा हुए तो अपनी सदाओं से डर गए

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अब कभी लौट के जाना न गवारा करना
यार जब करना तो फिर इश्क़ दुबारा करना

तुम को जाना हो तो बे-ख़ौफ़ चले जाना तुम
बारहा तुम ना बिछड़ने का इशारा करना

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आतिश-ए-इश्क़ में जब क़ल्ब-ए-शजर जलने लगा
हर कोई अहल-ए-नज़र दस्त-ए-अदब मलने लगा

मक़सद-ए-हज़रत-ए-राँझा की हिफाज़त के लिए
राह-ए-उल्फ़त पे मैं बे-खौफ़-ओ-ख़तर चलने लगा

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शायद तेरे ख़याल में आने लगा हूँ मैं
बे-ख़ौफ़ मेरे ख़्वाब में आने लगी है तू

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कैसे बे-ख़ौफ़ दिल में बैठा है
इश्क़ किस दर्जे का लुटेरा है

इस जहाँ में घना अँधेरा है
देर से सब दिखाई देता है

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करो बे-ख़ौफ़ उलफ़त अपने हमदम से ज़माने में
मुहब्बत करना कोई जुर्म थोड़ी है मेरे यारों

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आईने कह रहे हैं ये बे-ख़ौफ़-ओ-बे-ख़तर
पत्थर से जा के नज़रें मिलाएँगे आज हम

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ग़रीब-ओ-बे-कसों की सब हिमायत क्यूँ नहीं करते
ग़लत को तुम ग़लत कहने की जुरअत क्यूँ नहीं करते

अगर अहल-ए-जहाँ ज़िंदा हो तो बे-ख़ौफ़ होकर फिर
भला ज़ालिम हुकूमत की मज़म्मत क्यूँ नहीं करते

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बे-ख़ौफ़ बे-शुमार मिरे यार बाँटिए
नफ़रत नहीं जहाँ में फ़क़त प्यार बाँटिए

गुल दे के उन को कीजिए उन की मुख़ालिफ़त
जो लोग कह रहे हैं शजर ख़ार बाँटिए

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क्या क्या गुमाँ न थे हमें दीवार-ओ-दर के बीच
ऊँचाइयों पे जा के ख़लाओं से डर गए

मज
में' में कर रहे थे जो बे-ख़ौफ़ियों की बात
तन्हा हुए तो अपनी सदाओं से डर गए

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यह शब्द साहस और विद्रोह की भावना को समाहित करता है। कविता में, यह अक्सर विपत्ति से अप्रभावित दिल का प्रतीक होता है।

उन पात्रों को चित्रित करने के लिए उपयोग किया जाता है जो बहादुरी से चुनौतियों का सामना करते हैं। आत्मा की ताकत को उजागर करता है। अक्सर प्रतिरोध के विषयों के साथ जोड़ा जाता है।

कविता में बे-ख़ौफ़ अजेय मानव आत्मा को श्रद्धांजलि है।