kya kya gumaan na the hamein deewar-o-dar ke beech | क्या क्या गुमाँ न थे हमें दीवार-ओ-दर के बीच

  - Nashir Naqvi

क्या क्या गुमाँ न थे हमें दीवार-ओ-दर के बीच
ऊँचाइयों पे जा के ख़लाओं से डर गए

मजमे' में कर रहे थे जो बे-ख़ौफ़ियों की बात
तन्हा हुए तो अपनी सदाओं से डर गए

  - Nashir Naqvi

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    शोर मत करना अभी मेरी ग़ज़ल के पीछे
    हसरतें सोई हैं इस ताज-महल के पीछे

    ग़ौर करता हूँ तो कुछ ज़ाइक़ा बढ़ जाता है
    आँधियाँ झेली हैं पेड़ों ने भी फल के पीछे

    बस यही सोच के मैं अपने उठाता हूँ क़दम
    रूह चलती है बुज़ुर्गों की अमल के पीछे
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    Nashir Naqvi
    रंजिशें सब छोड़ दीं सबसे लड़ाई छोड़ दी
    ऐब था सच बोलना मैंने बुराई छोड़ दी

    कू-ए-जानाँ में भला अब देखने को क्या बचा
    सुन रहा हूँ आपने भी बेवफ़ाई छोड़ दी

    ज़ेहन में उभरे थे यूँ ही बेवफ़ा यारों के नाम
    लिखते लिखते क्यूँ क़लम ने रौशनाई छोड़ दी

    हमसे पूछो किस लिए ख़ाली ख़ज़ाने हो गए
    शाहज़ादों ने फ़क़ीरों की गदाई छोड़ दी
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    Nashir Naqvi
    कू-ए-जानाँ में भला अब देखने को क्या बचा
    सुन रहा हूँ आपने भी बेवफ़ाई छोड़ दी
    Nashir Naqvi
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