kya is ka gilaa kijeye use pyaar hi kab tha | क्या इस का गिला कीजे उसे प्यार ही कब था

  - Qateel Shifai

क्या इस का गिला कीजे उसे प्यार ही कब था
वो अहद-ए-फ़रामोश वफ़ादार ही कब था

उस ने तो सदा पूजे हैं उड़ते हुए जुगनू
वो चाँद-सितारों का परस्तार ही कब था

हम डूब गए जागती रातों के भँवर में
हाथ उस का हमारे लिए पतवार ही कब था

आमों की हसीं रुत के सिवा भी तो वो कूके
लेकिन किसी कोयल का ये किरदार ही कब था

आवाज़ जो मैं दूँ तो किसी और को छू ले
इस आँख-मिचोली से वो बेज़ार ही कब था

तुम उस को बुरे नाम से यारो न पुकारो
ये नाम उसे बाइस-ए-आज़ार ही कब था

मशहूर-ए-ज़माना हैं 'क़तील' उस की उड़ानें
वो दाम-ए-मोहब्बत में गिरफ़्तार ही कब था

  - Qateel Shifai

Qatil Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Qateel Shifai

As you were reading Shayari by Qateel Shifai

Similar Writers

our suggestion based on Qateel Shifai

Similar Moods

As you were reading Qatil Shayari Shayari