ishq ki ik rangeen sada par barase rang | इश्क़ की इक रंगीन सदा पर बरसे रंग

  - Swapnil Tiwari

इश्क़ की इक रंगीन सदा पर बरसे रंग
रंग हो मजनूँ और लैला पर बरसे रंग

  - Swapnil Tiwari

Ishq Shayari

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    हमारे बाद तेरे इश्क़ में नए लड़के
    बदन तो चूमेंगे ज़ुल्फ़ें नहीं सँवारेंगे
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    सफ़ेद बाल हुए हैं हमारा ख़ून नहीं

    न हम ही लौंडे लपाड़ी न कच्ची उम्र का वो
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    Shamim Abbas
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    Kumar Kaushal
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    उतरा उतरा तो यूँ चेहरा न घड़ी का होता
    ज़ायक़ा वक़्त का थोड़ा भी जो मीठा होता

    रात इक रोज़ तो मेले में निकलती अपने
    चाँद इक शाम तो पानी का बताशा होता

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    Swapnil Tiwari
    ये तुमने कैसा बना कर हमें किया है गुम
    ख़ुशी से झूम उठेगा जिसे मिलेंगे हम
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    दिल ज़बाँ ज़ेहन मिरे आज सँवरना चाहें
    सब के सब सिर्फ़ तिरी बात ही करना चाहें

    दाग़ हैं हम तिरे दामन के सो ज़िद्दी भी हैं
    हम कोई रंग नहीं हैं कि उतरना चाहें

    आरज़ू है हमें सहरा की सो हैं भी सैराब
    ख़ुश्क हो जाएँ हम इक पल में जो झरना चाहें

    ये बदन है तिरा ये आम सा रस्ता तो नहीं
    इस के हर मोड़ पे हम सदियों ठहरना चाहें

    ये सहर है तो भला चाहिए किस को ये कि हम
    शब की दीवार से सर फोड़ के मरना चाहें

    जैसे सोए हुए पानी में उतरता है साँप
    हम भी चुप-चाप तिरे दिल में उतरना चाहें

    आम से शख़्स के लगते हैं यूँ तो तेरे पाँव
    सारे दरिया ही जिन्हें छू के गुज़रना चाहें

    चाहते हैं कि कभी ज़िक्र हमारा वो करें
    हम भी बहते हुए पानी पे ठहरना चाहें

    नाम आया है तिरा जब से गुनहगारों में
    सब गवाह अपनी गवाही से मुकरना चाहें

    वस्ल और हिज्र के दरिया में वही उतरें जो
    इस तरफ़ डूब के उस ओर उभरना चाहें

    कोई आएगा नहीं टुकड़े हमारे चुनने
    हम इसी जिस्म के अंदर ही बिखरना चाहें
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    Swapnil Tiwari
    नदी की लय पे ख़ुद को गा रहा हूँ
    मैं गहरे और गहरे जा रहा हूँ

    चुरा लो चाँद तुम उस सम्त छुप कर
    मैं शब को उस तरफ़ रिजहा रहा हूँ

    वो सुर में सुर मिलाना चाहती है
    मैं अपनी धुन बदलता जा रहा हूँ

    यही मौक़ा है ख़ारिज कर दूँ ख़ुद को
    मैं अपने आप को दोहरा रहा हूँ
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    Swapnil Tiwari

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