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ये इत्तिफ़ाक़ ज़रूरी नहीं दोबारा हो
मैं तुम को सोचने बैठूँ तो ज़ख़्म भर जाएँ
मैं तुम को सोचने बैठूँ तो ज़ख़्म भर जाएँ
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ये जो दुनिया है इसे इतनी इजाज़त कब है
हम पे अपनी ही किसी बात का ग़ुस्सा उतरा
हम पे अपनी ही किसी बात का ग़ुस्सा उतरा
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किसी से झूठी मुहब्बत किसी से सच्चा बैर
मैं कर तो सकता हूँ ये सब मगर नहीं करूँगा
मैं कर तो सकता हूँ ये सब मगर नहीं करूँगा
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