ye ittifaaq zaroori nahin dobara ho | ये इत्तिफ़ाक़ ज़रूरी नहीं दोबारा हो

  - Abhishek shukla

ये इत्तिफ़ाक़ ज़रूरी नहीं दोबारा हो
मैं तुम को सोचने बैठूँ तो ज़ख्म भर जाएँ

  - Abhishek shukla

Teer Shayari

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    इक परिंदा अभी उड़ान में है
    तीर हर शख़्स की कमान में है
    Ameer Qazalbash
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    ठीक से ज़ख़्म का अंदाज़ा किया ही किसने
    बस सुना था कि बिछड़ते हैं तो मर जाते हैं
    Shariq Kaifi
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    तेरे लगाए हुए ज़ख़्म क्यूँ नही भरते
    मेरे लगाए हुए पेड़ सूख जाते हैं
    Tehzeeb Hafi
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    हर एक सितम पे दाद दी हर जख्म पे दुआ
    हमने भी दुश्मनों को सताया बहुत दिनों
    Nawaz Deobandi
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    ये बात अभी सबको समझ आई नहीं है
    दीवाना है दीवाना तमन्नाई नहीं है

    दिल मेरा दुखाकर ये मुझे तेरा मनाना
    मरहम है फ़क़त ज़ख्म की भरपाई नहीं है
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    Vikram Gaur Vairagi
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    कम अज़ कम इक ज़माना चाहता हूँ
    कि तुम को भूल जाना चाहता हूँ

    ख़ुदारा मुझ को तनहा छोड़ दीजे
    मैं खुल कर मुस्कुराना चाहता हूँ

    सरासर आप हूँ मद्दे मुक़ाबिल
    ख़ुदी ख़ुद को हराना चाहता हूँ

    मेरे हक़ में उरूस-ए-शब है मक़तल
    सो उस से लब मिलाना चाहता हूँ

    ये आलम है, कि अपने ही लहू में
    सरासर डूब जाना चाहता हूँ

    सुना है तोड़ते हो दिल सभों का
    सो तुम से दिल लगाना चाहता हूँ

    उसी बज़्म-ए-तरब की आरज़ू है
    वही मंज़र पुराना चाहता हूँ

    नज़र से तीर फैंको हो, सो मैं भी
    जिगर पर तीर खाना चाहता हूँ

    चराग़ों को पयाम-ए-ख़ामुशी दे
    तेरे नज़दीक आना चाहता हूँ
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    Kazim Rizvi
    तीर खाने की हवस है तो जिगर पैदा कर
    सरफ़रोशी की तमन्ना है तो सर पैदा कर
    Ameer Minai
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    जो सारे ज़ख्म मेरे भर दिया करता
    उसी के नाम का खंजर बनाया है
    Parul Singh "Noor"
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    सहर की आस लगाए हुए हैं वो कि जिन्हें
    कमान-ए-शब से चले तीर की ख़बर भी नहीं
    Abhishek shukla
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    ज़ख़्म है दर्द है दवा भी है
    जैसे जंगल है रास्ता भी है

    यूँ तो वादे हज़ार करता है
    और वो शख्स भूलता भी है

    हम को हर सू नज़र भी रखनी है
    और तेरे पास बैठना भी है

    यूँ भी आता नहीं मुझे रोना
    और मातम की इब्तिदा भी है

    चूमने हैं पसंद के बादल
    शाम होते ही लौटना भी है
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    Karan Sahar

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As you were reading Shayari by Abhishek shukla

    आबरू-ए-शब-ए-तीरा नहीं रखने वाले
    हम कहीं पर भी अँधेरा नहीं रखने वाले

    आइना रखने का इल्ज़ाम भी आया हम पर
    जब कि हम लोग तो चेहरा नहीं रखने वाले

    हम पे फ़रहाद का कुछ क़र्ज़ निकलता है सो हम
    तुम कहो भी तो ये तेशा नहीं रखने वाले

    हम को मालूम हैं अज़-रु-ए-मोहब्बत सो हम
    कोई भी दर्द ज़ियादा नहीं रखने वाले
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    Abhishek shukla
    ये आग वाग का दरिया तो खेल था हम को
    जो सच कहें तो बड़ा इम्तिहान आँसू हैं
    Abhishek shukla
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    शब भर इक आवाज़ बनाई सुब्ह हुई तो चीख़ पड़े
    रोज़ का इक मामूल है अब तो ख़्वाब-ज़दा हम लोगों का
    Abhishek shukla
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    ये इम्तियाज़ ज़रूरी है अब इबादत में
    वही दुआ जो नज़र कर रही है लब भी करें
    Abhishek shukla
    25 Likes
    पुकार उसे कि अब इस ख़ामुशी का हल निकले
    जवाब आये तो मुम्किन है बात चल निकले

    ज़माना आग था और इश्क़ लौ लगी रस्सी
    हज़ार जल के भी कब इस बला के बल निकले

    मैं अपनी ख़ाक पे इक उम्र तक बरसता रहा
    थमा तो देखा कि कीचड़ में कुछ कमल निकले

    मैं जिसमें ख़ुश भी था, ज़िन्दा भी था,तुम्हारा भी था
    कई ज़माने निचोडूं तो एक पल निकले

    कुछ एक ख़्वाब वहां बो रहूंगा, सोचा है
    वो नैन अगर मेरे नैनों से भी सजल निकले

    मैं अपने हाथों को रोता था हर दुआ के बाद
    ख़ुदा के हाथ तो मुझसे ज़ियादः शल निकले

    दयार ए इश्क़ में सबका गुज़र नहीं मुम्किन
    कई जो पैरों पे आये थे,सर के बल निकले

    बहार जज़्ब है जिसमें, उसे बनाते हुए
    तमाम रंग मेरे कैनवस पे डल निकले

    जमी हुई थी मेरी आंख इक अलाव के गिर्द
    कुछ एक ख़्वाब तो यूंही पिघल पिघल निकले

    बदल के रख ही दिया मुझको उम्र भर के लिए
    तेरी ही तरह तेरे ग़म भी बेबदल निकले

    जो दिल में आये थे आहट उतार कर अपनी
    वो दिल से निकले तो फिर कितना पुर ख़लल निकले
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    Abhishek shukla

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