रात आते ही सुकूँ का मसअला आ जाएगा

सोते सोते याद कोई वाक़िआ' आ जाएगा

वो तुम्हारा लम्स जो पत्ता है ऊँची डाल का
हाथ पहुँचे तक तो मौसम दूसरा आ जाएगा

मैं ने तूफ़ाँ को सदाएँ दी थी औरों के लिए
क्या ख़बर थी रास्ते में घर मेरा आ जाएगा

एक मुट्ठी प्यार उस के पास काँसे बे-शुमार
वो अगर बाँटे भी तो हिस्से में क्या आ जाएगा

मैं उसे बीते हुए लम्हों से मारूँगा 'ज़फ़र'
जब वो ज़ख़्मी हो के तड़पेगा मज़ा आ जाएगा

— Zafar Gorakhpuri

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