door ke ek nazaare se nikal kar aayi | दूर के एक नज़ारे से निकल कर आई

  - Dilawar Ali Aazar

दूर के एक नज़ारे से निकल कर आई
रौशनी मुझ में सितारे से निकल कर आई

जिस ने कश्ती को डुबोया सर-ओ-सामान समेत
वो घनी मौज किनारे से निकल कर आई

राख झाड़ी जो बदन की तो अचानक बाहर
आग ही आग शरारे से निकल कर आई

पेड़ मबहूत हुए देख के इस मंज़र को
धूप जब उस के इशारे से निकल कर आई

आँख में अश्क रियाज़त से हुआ है पैदा
ये नमी वक़्त के धारे से निकल कर आई

कौन तकिया करे महताब की उस रौशनी पर
सामने भी जो सहारे से निकल कर आई

ख़ुद भी हैरान हूँ ये सोच के 'आज़र' अब तक
ज़िंदगी कैसे ख़सारे से निकल कर आई

  - Dilawar Ali Aazar

Aansoo Shayari

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