bojh uthaaye hue din raat kahaan tak jaata | बोझ उठाए हुए दिन रात कहाँ तक जाता

  - Dilawar Ali Aazar

बोझ उठाए हुए दिन रात कहाँ तक जाता
ज़िंदगानी में तिरे साथ कहाँ तक जाता

मुख़्तसर ये कि मैं बोसा भी ग़नीमत समझा
यूँँ भी दौरान-ए-मुलाक़ात कहाँ तक जाता

सुब्ह होते ही सभी घर को रवाना होंगे
क़िस्सा-ए-दौर-ए-ख़राबात कहाँ तक जाता

थक गया था मैं तिरे नाम को जपते जपते
ले के होंटों पे यही बात कहाँ तक जाता

चाँद तारे तो मिरे बस में नहीं हैं 'आज़र'
फूल लाया हूँ मिरा हाथ कहाँ तक जाता

  - Dilawar Ali Aazar

Rose Shayari

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