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कोई मेरी तरह जिए तो सही
ज़िंदगी दर-गुलू अजल बर-दोश
दीदनी थी ये काएनात बहुत
हम भी कुछ दिन रहे ख़राब-ए-होश
घर से तौफ़-ए-हरम को निकला था
राह में थी दुकान-ए-बादा-फ़रोश
इक तअ'ल्लुक़ क़दम को राह से है
मैं न आवारा हूँ न ख़ाना-ब-दोश
हम से ग़ाफ़िल नहीं हैं अहल-ए-सितम
इक ज़रा थक के हो गए हैं ख़मोश
जी में है कोई आरज़ू कीजे
या'नी बाक़ी है सर में मस्ती होश
है ये दुनिया बहुत वसीअ' तो हो
मैं हूँ और तेरा हल्का-ए-आग़ोश
दिल को रोते कहाँ तलक 'अख़्तर'
आख़िर-कार हो गए ख़ामोश
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सुलगते ख़्वाबों की बस्ती है रह-गुज़ार-ए-हयात
यहाँ धुआँ ही धुआँ है ज़रा सँभल के चलो
रविश रविश है गुज़र-गाह-ए-निकहत-ए-बर्बाद
कली कली निगराँ है ज़रा सँभल के चलो
जो ज़ख़्म दे के गई है अभी नसीम-ए-सहर
सुकूत-ए-गुल से अयाँ है ज़रा सँभल के चलो
ख़िराम-ए-नाज़ मुबारक तुम्हें मगर ये दिल
मता-ए-शीशा-गराँ है ज़रा सँभल के चलो
सुराग़-ए-हश्र न पा जाएँ देखने वाले
हुजूम-ए-दीदा-वराँ है ज़रा सँभल के चलो
यहाँ ज़मीन भी क़दमों के साथ चलती है
ये आलम-ए-गुज़राँ है ज़रा सँभल के चलो
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तुम हो या छेड़ती है याद-ए-सहर कोई तो है
खटखटाता है जो ये ख़्वाब का दर कोई तो है
खटखटाता है जो ये ख़्वाब का दर कोई तो है
दिल पे पड़ती हुई दुज़्दीदा-नज़र कोई तो है
जिस तरफ़ देख रहा हूँ मैं उधर कोई तो है
ऐसे नादाँ नहीं रातों में भटकने वाले
जागती आँखों में ख़ुर्शीद-ए-सहर कोई तो है
ख़ुद-ब-ख़ुद हाथ गरेबाँ की तरफ़ उठते हैं
सरसराती सी हवाओं में ख़बर कोई तो है
किस का मुँह देख रही है सफ़र-आमादा हयात
सू-ए-मक़्तल ही सही राह-गुज़र कोई तो है
तू मुझे देख मिरे पाँव के छालों पे न जा
ज़िंदगी तेरे लिए ख़ाक-बसर कोई तो है
दिन कटा सारा ख़राबों में भटकते 'अख़्तर'
शाम होती है चलो ख़ैर से घर कोई तो है
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सफ़र ही शर्त-ए-सफ़र है तो ख़त्म क्या होगा
तुम्हारे घर से उधर भी ये रास्ता होगा
तुम्हारे घर से उधर भी ये रास्ता होगा
ज़माना सख़्त गिराँ ख़्वाब है मगर ऐ दिल
पुकार तो सही कोई तो जागता होगा
ये बे-सबब नहीं आए हैं आँख में आँसू
ख़ुशी का लम्हा कोई याद आ गया होगा
मिरा फ़साना हर इक दिल का माजरा तो न था
सुना भी होगा किसी ने तो क्या सुना होगा
फिर आज शाम से पैकार जान ओ तन में है
फिर आज दिल ने किसी को भुला दिया होगा
विदा कर मुझे ऐ ज़िंदगी गले मिल के
फिर ऐसा दोस्त न तुझ से कभी जुदा होगा
मैं ख़ुद से दूर हुआ जा रहा हूँ फिर 'अख़्तर'
वो फिर क़रीब से हो कर गुज़र गया होगा
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मैं ने माना एक न इक दिन लौट के तू आ जाएगा
लेकिन तुझ बिन उम्र जो गुज़री कौन उसे लौटाएगा
लेकिन तुझ बिन उम्र जो गुज़री कौन उसे लौटाएगा
हिज्र के सद
में उस का तग़ाफ़ुल बातें हैं सब कहने की
कुछ भी न मुझ को याद रहेगा जब वो गले लग जाएगा
ख़्वाब-ए-वफ़ा आँखों में बसाए फिरता है क्या दीवाने
ताबीरें पथराव करेंगी जब तू ख़्वाब सुनाएगा
कितनी यादें कितने क़िस्से नक़्श हैं इन दीवारों पर
चलते चलते देख लें मुड़ कर कौन यहाँ फिर आएगा
बाद-ए-बहारी इतना बता दे सादा-दिलान-ए-मौसम को
सर्फ़-ए-चमन जो ख़ून हुआ है रंग वो कब तक लाएगा
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जान दी किस के लिए हम ये बताएँ किस को
कौन क्या भूल गया याद दिलाएँ किस को
कौन क्या भूल गया याद दिलाएँ किस को
जुर्म की तरह मोहब्बत को छुपा रक्खा है
हम गुनहगार नहीं हैं ये बताएँ किस को
रूठ जाते तो मनाना कोई दुश्वार न था
वो तअ'ल्लुक़ ही न रक्खें तो मनाएँ किस को
कौन देता है यहाँ ख़्वाब-ए-जुनूँ की ता'बीर
ख़्वाब हम अपने सुनाएँ तो सुनाएँ किस को
कोई पुरसान-ए-वफ़ा है न पशीमान-ए-जफ़ा
ज़ख़्म हम अपने दिखाएँ तो दिखाएँ किस को
चाक-ए-दिल चाक-ए-गरेबाँ तो नहीं हम-नफ़सो
हम ये तस्वीर सर-ए-बज़्म दिखाएँ किस को
कौन इस शहर में सुनता है फ़ुग़ान-ए-दुर्वेश
अपनी आशुफ़्ता-बयानी से रुलाएँ किस को
हो गया ख़ाक रह-ए-कू-ए-मलामत 'अख़्तर'
राह पर लाएँ जो अहबाब तो लाएँ किस को
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अब उन आँखों में वो अगली सी निदामत भी नहीं
अब दिल-ए-ज़ार की हालत नहीं देखी जाती
बंद कर दे कोई माज़ी का दरीचा मुझ पर
अब इस आईने में सूरत नहीं देखी जाती
आप की रंजिश-ए-बेजा ही बहुत है मुझ को
दिल पे हर ताज़ा मुसीबत नहीं देखी जाती
तू कहानी ही के पर्दे में भली लगती है
ज़िंदगी तेरी हक़ीक़त नहीं देखी जाती
लफ़्ज़ उस शोख़ का मुँह देख के रह जाते हैं
लब-ए-इज़हार की हसरत नहीं देखी जाती
दुश्मन-ए-जाँ ही सही साथ तो इक उम्र का है
दिल से अब दर्द की रुख़्सत नहीं देखी जाती
देखा जाता है यहाँ हौसला-ए-क़ता-ए-सफ़र
नफ़स-ए-चंद की मोहलत नहीं देखी जाती
देखिए जब भी मिज़ा पर है इक आँसू 'अख़्तर'
दीदा-ए-तर की रिफ़ाक़त नहीं देखी जाती
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ज़िंदगी क्या हुए वो अपने ज़माने वाले
याद आते हैं बहुत दिल को दुखाने वाले
याद आते हैं बहुत दिल को दुखाने वाले
रास्ते चुप हैं नसीम-ए-सहरी भी चुप है
जाने किस सम्त गए ठोकरें खाने वाले
अजनबी बन के न मिल उम्र-ए-गुरेज़ाँ हम से
थे कभी हम भी तिरे नाज़ उठाने वाले
आ कि मैं देख लूँ खोया हुआ चेहरा अपना
मुझ से छुप कर मिरी तस्वीर बनाने वाले
हम तो इक दिन न जिए अपनी ख़ुशी से ऐ दिल
और होंगे तिरे एहसान उठाने वाले
दिल से उठते हुए शोलों को कहाँ ले जाएँ
अपने हर ज़ख़्म को पहलू में छुपाने वाले
निकहत-ए-सुब्ह-ए-चमन भूल न जाना कि तुझे
थे हमीं नींद से हर रोज़ जगाने वाले
हँस के अब देखते हैं चाक-ए-गरेबाँ मेरा
अपने आँसू मिरे दामन में छुपाने वाले
किस से पूछूँ ये सियह रात कटेगी किस दिन
सो गए जा के कहाँ ख़्वाब दिखाने वाले
हर क़दम दूर हुई जाती है मंज़िल हम से
राह-ए-गुम-कर्दा हैं ख़ुद राह दिखाने वाले
अब जो रोते हैं मिरे हाल-ए-ज़बूँ पर 'अख़्तर'
कल यही थे मुझे हँस हँस के रुलाने वाले
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