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अपनी बहार पे हँसने वालो कितने चमन ख़ाशाक हुए
अपने रफ़ू को गिनने वालो कितने गरेबाँ चाक हुए
अपने रफ़ू को गिनने वालो कितने गरेबाँ चाक हुए
दीवानों को कौन बताए आज की रस्म और आज की बात
इस ने उन्हीं की सम्त नज़र की इश्क़ में जो बेबाक हुए
शोबद-ए-यक तर्ज़-ए-करम है कैसी सज़ा और कैसी जज़ा
मौज-ए-तबस्सुम जब लहराई तर-दामन भी पाक हुए
रुख़ देखा जिस सम्त हवा का उस जानिब मुँह कर के चले
दश्त-ए-जुनूँ के दीवाने भी मिस्ल-ए-सबा चालाक हुए
ख़ाक-ए-नशेमन जब उड़ती है दिल से धुआँ सा उठता है
हादसे इस गुलज़ार में वर्ना और बहुत ग़मनाक हुए
देखते देखते दुनिया बदली गुलशन क्या वीराना क्या
पर्बत पर्बत नक़्श थे जिन के मिटते मिटते ख़ाक हुए
जान-ए-चमन जो गुल थे 'अख़्तर' वो तो हुए मा'तूब ओ ज़लील
ज़ेब-ए-गुलिस्ताँ रौनक़-ए-गुलशन कल के ख़स-ओ-ख़ाशाक हुए
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साफ़ ज़ाहिर है निगाहों से कि हम मरते हैं
मुँह से कहते हुए ये बात मगर डरते हैं
मुँह से कहते हुए ये बात मगर डरते हैं
एक तस्वीर-ए-मोहब्बत है जवानी गोया
जिस में रंगों के एवज़ ख़ून-ए-जिगर भरते हैं
इशरत-ए-रफ़्ता ने जा कर न किया याद हमें
इशरत-ए-रफ़्ता को हम याद किया करते हैं
आसमाँ से कभी देखी न गई अपनी ख़ुशी
अब ये हालत है कि हम हँसते हुए डरते हैं
शे'र कहते हो बहुत ख़ूब तुम 'अख़्तर' लेकिन
अच्छे शाइ'र ये सुना है कि जवाँ मरते हैं
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आईना-ए-निगाह में अक्स-ए-शबाब है
दुनिया समझ रही है कि आँखों में ख़्वाब है
दुनिया समझ रही है कि आँखों में ख़्वाब है
रोए बग़ैर चारा न रोने की ताब है
क्या चीज़ उफ़ ये कैफ़ियत-ए-इज़्तिराब है
ऐ सोज़-ए-जाँ-गुदाज़ अभी मैं जवान हूँ
ऐ दर्द-ए-ला-इलाज ये उम्र-ए-शबाब है
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कोई मआल-ए-मोहब्बत मुझे बताओ नहीं
मैं ख़्वाब देख रहा हूँ मुझे जगाओ नहीं
मैं ख़्वाब देख रहा हूँ मुझे जगाओ नहीं
किसी की याद है उन की महक से वाबस्ता
मुझे ये फूल ख़ुदा के लिए सुँघाओ नहीं
मोहब्बत और जवानी के तज़्किरे न करो
किसी सताए हुए को बहुत सताओ नहीं
ये कह रहा है मोहब्बत की काविशों से दिल
ये मेरे हँसने के दिन हैं मुझे रुलाओ नहीं
उजड़ के फिर नहीं बस्ता जहान-ए-दिल 'अख़्तर'
बहार-ए-बाग़ को इस पर दलील लाओ नहीं
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मस्त हूँ मैं मिरी नज़र से भी
बादा-ए-लाला-गूँ टपकता है
हाँ कभी ख़्वाब-ए-इश्क़ देखा था
अब तक आँखों से ख़ूँ टपकता है
आह 'अख़्तर' मेरी हँसी से भी
मेरा हाल-ए-ज़बूँ टपकता है
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अपनी उजड़ी हुई दुनिया की कहानी हूँ मैं
एक बिगड़ी हुई तस्वीर-ए-जवानी हूँ मैं
एक बिगड़ी हुई तस्वीर-ए-जवानी हूँ मैं
आग बन कर जो कभी दिल में निहाँ रहता था
आज दुनिया में उसी ग़म की निशानी हूँ मैं
हाए क्या क़हर है मरहूम जवानी की याद
दिल से कहती है कि ख़ंजर की रवानी हूँ मैं
आलम-अफ़रोज़ तपिश तेरे लिए लाया हूँ
ऐ ग़म-ए-इश्क़ तिरा अहद-ए-जवानी हूँ मैं
चर्ख़ है नग़्मागर अय्याम हैं नग़्में 'अख़्तर'
दास्ताँ-गो है ग़म-ए-दहर कहानी हूँ मैं
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फूल सूँघे जाने क्या याद आ गया
दिल अजब अंदाज़ से लहरा गया
दिल अजब अंदाज़ से लहरा गया
उस से पूछे कोई चाहत के मज़े
जिस ने चाहा और जो चाहा गया
एक लम्हा बन के ऐश-ए-जावेदाँ
मेरी सारी ज़िंदगी पर छा गया
ग़ुंचा-ए-दिल हाए कैसा ग़ुंचा था
जो खिला और खिलते ही मुरझा गया
रो रहा हूँ मौसम-ए-गुल देख कर
मैं समझता था मुझे सब्र आ गया
ये हवा ये बर्ग-ए-गुल का एहतिज़ाज़
आज मैं राज़-ए-मुसर्रत पा गया
'अख़्तर' अब बरसात रुख़्सत हो गई
अब हमारा रात का रोना गया
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दिल का ख़ूँ आँखों में खिंच आया चलो अच्छा हुआ
मेरी आँखों को मिरा अहवाल कहना आ गया
सहल हो जाएगी मुश्किल ज़ब्त सोज़ ओ साज़ की
ख़ून-ए-दिल को आँख से जिस रोज़ बहना आ गया
मैं किसी से अपने दिल की बात कह सकता न था
अब सुख़न की आड़ में क्या कुछ न कहना आ गया
जब से मुँह को लग गई 'अख़्तर' मोहब्बत की शराब
बे-पिए आठों पहर मदहोश रहना आ गया
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