बुलंद बाँग दा'वों की
आवाज़ें
आवाज़ें
खोटे सिक्कों की तरह
बजती हैं
फिर भी छोटे क़द के लोग
इन क़द-आवर आवाज़ों को
सुनते रहते हैं
काग़ज़ के टुकड़ों की
अब कोई क़ीमत न रही
फिर भी भूकी आँखें
उन्हें ढूँढती हैं
और नाकाम रहती हैं
और बे-रहम हाथ
उन्हें जम्अ'' करते रहते हैं
छोटे क़द के लोग
अपनी आवाज़ खो चुके हैं
वो सिर्फ़ देख सकते हैं
और सुन सकते हैं
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फिर भी छोटे क़द के लोग
इन क़द-आवर आवाज़ों को
सुनते रहते हैं
काग़ज़ के टुकड़ों की
अब कोई क़ीमत न रही
फिर भी भूकी आँखें
उन्हें ढूँढती हैं
और नाकाम रहती हैं
और बे-रहम हाथ
उन्हें जम्अ'' करते रहते हैं
छोटे क़द के लोग
अपनी आवाज़ खो चुके हैं
वो सिर्फ़ देख सकते हैं
और सुन सकते हैं
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ख़्वाहिश के शिकारी कुत्ते
मेरा पीछा कर रहे हैं
Read Fullमेरा पीछा कर रहे हैं
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टूटी हुई बोतल की तरह
बे-कार बे-मक़्सद
बे-कार बे-मक़्सद
ज़िंदगी के ताक़ में
रक्खा हुआ हूँ मैं
वो कौन था जो छोड़ गया
मेरे वजूद के शीशे पर
अपनी लहू रंग यादों के
निशाँ
उस से पहले कि बारिश
उन निशानात को धो डाले
मैं रेज़ा रेज़ा हो जाऊँ
फ़र्श पर बिखर जाऊँ
वक़्त के पैरों में चुभ जाऊँ
फ़र्श ज़मीं को रंगीं कर दूँ
और ख़ुद भी रंगीं हो जाऊँ
Read Fullरक्खा हुआ हूँ मैं
वो कौन था जो छोड़ गया
मेरे वजूद के शीशे पर
अपनी लहू रंग यादों के
निशाँ
उस से पहले कि बारिश
उन निशानात को धो डाले
मैं रेज़ा रेज़ा हो जाऊँ
फ़र्श पर बिखर जाऊँ
वक़्त के पैरों में चुभ जाऊँ
फ़र्श ज़मीं को रंगीं कर दूँ
और ख़ुद भी रंगीं हो जाऊँ
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धूप कितनी ख़ूब-सूरत है यहाँ
हसीं चेहरों पर धूप
हसीं चेहरों पर धूप
ताज-महल पर धूप
हुस्न ख़ुद चल कर यहाँ
हुस्न को देखने आता है
मैं चलते-फिरते हुस्न में
ऐसा खोया हूँ
कि कुछ समझ में नहीं आता
ताज को देखूँ या हुस्न-ए-गुरेज़ाँ को
Read Fullहुस्न ख़ुद चल कर यहाँ
हुस्न को देखने आता है
मैं चलते-फिरते हुस्न में
ऐसा खोया हूँ
कि कुछ समझ में नहीं आता
ताज को देखूँ या हुस्न-ए-गुरेज़ाँ को
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सता रही है बहुत मछलियों की बास मुझे
बुला रहा है समुंदर फिर अपने पास मुझे
बुला रहा है समुंदर फिर अपने पास मुझे
हवस का शीशा-ए-नाज़ुक हूँ फूट जाऊँगा
न मार खींच के इस तरह संग-ए-यास मुझे
मैं क़ैद में कभी दीवार-ओ-दर की रह न सका
न आ सका कभी शहरों का रंग रास मुझे
मैं तेरे जिस्म के दरिया को पी चुका हूँ बहुत
सता रही है फिर अब क्यूँ बदन की प्यास मुझे
मिरे बदन में छुपा है समुंदरों का फ़ुसूँ
जला सकेगी भला क्या ये ख़ुश्क घास मुझे
गिरेगा टूट के सर पर ये आसमान कभी
डराए रखता है हर दम मिरा क़यास मुझे
झुलस रहा हूँ मैं सदियों से ग़म के सहरा में
मगर है अब्र-ए-गुरेज़ाँ की फिर भी आस मुझे
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ख़्वाब आँखों में निहाँ है अब भी
बुझ गई आग धुआँ है अब भी
बुझ गई आग धुआँ है अब भी
वो मिरे पास नहीं है लेकिन
उस के होने का गुमाँ है अब भी
क्या बहादुर कोई आया ही नहीं
राह में संग-ए-गिराँ है अब भी
कोई प्यासा ही नहीं है वर्ना
चश्मा-ए-शौक़ रवाँ है अब भी
घर को काँधे पे लिए फिरता हूँ
मुझ में ये ताब-ओ-तवाँ है अब भी
मैं तअल्लुक़ से परे हूँ लेकिन
मुझ से वाबस्ता जहाँ है अब भी
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मैं राहगीरों की हिम्मत बँधाने वाला हूँ
मिरे वजूद में शामिल शराब रहने दे
तबाह ख़ुद को मैं कर लूँ बदन को छू के तिरे
तू अपने लम्स का मुझ पर अज़ाब रहने दे
ज़रा ठहर कि अभी ख़ून में समाई नहीं
मिरे क़रीब बदन की शराब रहने दे
भुला चुका हूँ मैं सब कुछ दिला न याद मुझे
जो खो चुका हूँ अब उस का हिसाब रहने दे
जला लिया है बदन अपनी आग में मैं ने
बुझा न इस को अभी ये अज़ाब रहने दे
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शगुफ़्ता फूल परेशाँ हुआ तो ग़म न करो
कि वो तो यूँ भी हवा में बिखरने वाला था
मैं उस को देख के फिर कुछ न देख पाऊँगा
ये हादिसा भी मुझी पर गुज़रने वाला था
सदा-ए-संग ने मुझ को बचा लिया वर्ना
मैं इस पहाड़ से टकरा के मरने वाला था
मैं बे-क़ुसूर हूँ ये फ़ैसला हुआ वर्ना
मैं अपने जुर्म का इक़रार करना वाला था
पहाड़ सीना-सिपर हो गया था मेरे लिए
वगर्ना मुझ में समुंदर उतरने वाला था
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