Akhtar Ansari

Akhtar Ansari

@akhtar-ansari

Akhtar Ansari shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Akhtar Ansari's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

2

Content

52

Likes

100

Shayari
Audios
  • Sher
  • Ghazal

Sher

मैं किसी से अपने दिल की बात कह सकता न था अब सुख़न की आड़ में क्या कुछ न कहना आ गया — Akhtar Ansari
जब से मुँह को लग गई 'अख़्तर' मोहब्बत की शराब बे-पिए आठों पहर मदहोश रहना आ गया — Akhtar Ansari
उस से पूछे कोई चाहत के मज़े जिस ने चाहा और जो चाहा गया — Akhtar Ansari
याद-ए-माज़ी 'अज़ाब है या-रब छीन ले मुझ से हाफ़िज़ा मेरा — Akhtar Ansari
अपनी उजड़ी हुई दुनिया की कहानी हूँ मैं एक बिगड़ी हुई तस्वीर-ए-जवानी हूँ मैं — Akhtar Ansari
रोए बग़ैर चारा न रोने की ताब है क्या चीज़ उफ़ ये कैफ़ियत-ए-इज़्तिराब है — Akhtar Ansari
हाँ कभी ख़्वाब-ए-इश्क़ देखा था अब तक आँखों से ख़ूँ टपकता है — Akhtar Ansari

Ghazal

सुना के अपने ऐश-ए-ताम की रूदाद के टुकड़े उड़ा दूँगा किसी दिन चर्ख़ की बेदाद के टुकड़े असीरी को अता कर के असीरी का शरफ़ हम ने उड़ा डाले ख़ुद अपनी फ़ितरत-ए-आज़ाद के टुकड़े कहाँ का आदमी इंसान कैसा मा-हसल ये है कहीं अश्ख़ास के पुर्ज़े कहीं अफ़राद के टुकड़े तबाही के मज़ों से भी गए अब वाए-महरूमी समेटूँगा कहाँ तक हसरत-ए-बर्बाद के टुकड़े ये सीना तल्ख़ यादों का ख़ज़ीना ही सही लेकिन बहुत चुभते हैं दिल में इक नुकीली याद के टुकड़े तुम अच्छे ही सही मेरा बुरा होना भी है बर-हक़ कि हम सब हैं किसी मजमूअ-ए-अज़दाद के टुकड़े हमें लख़्त-ए-जिगर खाने को हरगिज़ कम न था 'अख़्तर' मगर क़िस्मत में लिक्खे थे जहानाबाद के टुकड़े — Akhtar Ansari
तिरा आसमाँ नावकों का ख़ज़ीना हयात-आफ़रीना हयात-आफ़रीना हमारी ज़मीं ला'ल-ओ-गुल का दफ़ीना हयात-आफ़रीना हयात-आफ़रीना हुए नाम और नंग सब ग़र्क़-ए-सहबा मिरी मय-गुसारी की होगी सज़ा क्या तिरे नाम का एक जुरआ' यही ना हयात-आफ़रीना हयात-आफ़रीना तिरे वादा-ए-रिज़्क की है दुहाई अगर रिज़्क़ आज़ूक़ा-ए-रूह भी है तो हम तो हैं महरूम-ए-नान-ए-शबीना हयात-आफ़रीना हयात-आफ़रीना न साँसों में जोश-ए-नुमू का तलातुम न मरने के ग़म में गुदाज़-ए-तअल्लुम ये जीना भी है कोई जीने में जीना हयात-आफ़रीना हयात-आफ़रीना ज़मीं का कलेजा बहुत फुंक रहा है फ़लक फट पड़े क़ुल्ज़ुम-ए-ख़ूँ रवाँ हो जबीन-ए-मशिय्यत से टपके पसीना हयात-आफ़रीना हयात-आफ़रीना मह-ओ-मेहर-ओ-अंजुम फ़लक के दुलारे तिरी मुम्लिकत के हसीं शाहज़ादे हमारी ज़मीं काएनाती हसीना हयात-आफ़रीना हयात-आफ़रीना नहीं 'अख़्तर'-ए-ज़ार मायूस ख़ुद से कि ज़ुल्मत भी छटती है दर्जा-ब-दर्जा उतरती है रहमत भी ज़ीना-ब-ज़ीना हयात-आफ़रीना हयात-आफ़रीना — Akhtar Ansari
चर्ख़ की सई-ए-जफ़ा कोशिश नाकारा है गर्दिश-ए-दहर यहाँ जुम्बिश-ए-गहवारा है चाँद तारों के तलातुम से ये आता है ख़याल दिल-ए-वहशी कोई तूफ़ाँ-ज़दा सय्यारा है बह गए दीदा-ए-नम-नाक से दरिया लेकिन दिल वही एक दहकता हुआ अँगारा है दिल हुआ सोज़-ए-जहन्नम में गिरफ़्तार मगर रूह अब भी किसी फ़िरदौस में आवारा है कैसी तक़दीर की गर्दिश ग़म-ए-दिल को मैं ने गर्दिश-ए-गुम्बद-ए-अफ़्लाक पे दे मारा है मेरे शे'रों से तार्रुज़ न कर ऐ नाक़िद-ए-फ़न मेरी बर्बादी-ए-दिल ही मिरा शह-पारा है बहजत-ए-फ़िक्र पे क़ादिर हूँ मैं जब तक 'अख़्तर' मुझे सरमाया-ए-अंदोह बहुत प्यारा है — Akhtar Ansari
जाँ-सिपारी के भी अरमाँ ज़िंदगी की आस भी हिफ़्ज़-ए-नामूस-ए-अलम भी नीश-ए-ग़म का पास भी ख़ाक दर-बर ही सही मैं ख़ाक भी वो ख़ाक है जिस में मेरे ज़ख़्म-ए-दिल की बू भी है और बास भी कितने दौर-ए-चर्ख़ उन आँखों ने देखे कुछ न पूछ मिट चुका है वक़्त की रफ़्तार का एहसास भी हाए वो इक नश्तर-आगीं नेश्तर-अफ़रोज़ याद जिस के आगे हेच अपनी बुर्रिश-ए-इंफ़ास भी हम न थे कुछ ख़ुद ही उस सौदे पे राज़ी वर्ना यूँँ रास आने को ये दुनिया आ ही जाती रास भी ख़ुद को ऐ दिल यास-ए-कामिल के हवाले यूँँ न कर झाँकती है ज़ेहन के ग़ुर्फ़े से कोई आस भी कौन उस वादी से उछला ता-सर-ए-अर्श-ए-बरीं गुम हैं जिस वादी में 'अख़्तर' ख़िज़्र भी इल्यास भी — Akhtar Ansari
किसी से लड़ाएँ नज़र और झेलें मोहब्बत के ग़म इतनी फ़ुर्सत कहाँ उठाएँ किसी माह-पैकर हसीना के जौर-ओ-सितम इतनी फ़ुर्सत कहाँ ज़माने की बे-रहमियों के तसद्दुक़ दिमाग़-ए-नशात-ओ-अलम ही नहीं दिल अपना करे आरज़ू-ए-जफ़ा या उमीद-ए-करम इतनी फ़ुर्सत कहाँ डुबो दें मय-ए-नाब की मस्तियों में फ़लाकत के नक्बत के एहसास को बना लें किसी आमियाना से कूज़े ही को जाम-ए-जम इतनी फ़ुर्सत कहाँ हों आज़ाद-ए-अफ़्कार लेकिन तफ़क्कुर में डूबे हुए से रहें रात दिन तबीअत की बे-वज्ह अफ़्सुर्दगी के मज़े लूटें हम इतनी फ़ुर्सत कहाँ न माज़ी हमारा न मुस्तक़बिल अपना कुछ इस तौर से हर्फ़-ए-इमरोज़ हैं ग़म-ए-दोश या फ़िक्र-ए-फ़र्दा में 'अख़्तर' करें सर को ख़म इतनी फ़ुर्सत कहाँ — Akhtar Ansari
पुर-कैफ़ ज़ियाएँ होती हैं पुर-नूर उजाले होते हैं जब ख़ाक-बसर दिल होता है और अर्श पे नाले होते हैं हँसते हैं दहान-ए-ज़ख़्म से हम गाते हैं फ़ुग़ाँ के बरबत पर आशुफ़्ता-सरों की दुनिया के सब ढंग निराले होते हैं क्या क़हर बरसता है दिल पर सावन की शबों में क्या कहिए कुछ दर्द की फुवारें होती हैं कुछ यास के झाले होते हैं इन उजड़े हुए अरमानों को किस शौक़ से दिल ने सींचा था बर्बाद मगर होते हैं वही जो नाम के पाले होते हैं चाहत के सितम बर्दाश्त करें मर मर के जिएँ और मर न सकें क्या जानिए किस मिट्टी के बने ये चाहने वाले होते हैं दिल तंग न हो ऐ रह-रव-ए-ग़म काँटों के लिए तो कम से कम मानिंद-ए-नवेद-ए-अब्र-ए-करम ये पाँव के छाले होते हैं उफ़-रे वो नज़ाकत लहजे की बातें जो निकलती हैं मुँह से या चाँद की किरनें होती हैं या बर्फ़ के गाले होते हैं ये दर्द-ए-जुनूँ ये सोज़-ए-जिगर इन कैफ़ियतों के गिर्द 'अख़्तर' तस्ख़ीर के हल्क़े हों कि न हों तक़्दीस के हाले होते हैं — Akhtar Ansari
अपनी बहार पे हँसने वालो कितने चमन ख़ाशाक हुए अपने रफ़ू को गिनने वालो कितने गरेबाँ चाक हुए दीवानों को कौन बताए आज की रस्म और आज की बात इस ने उन्हीं की सम्त नज़र की इश्क़ में जो बेबाक हुए शोबद-ए-यक तर्ज़-ए-करम है कैसी सज़ा और कैसी जज़ा मौज-ए-तबस्सुम जब लहराई तर-दामन भी पाक हुए रुख़ देखा जिस सम्त हवा का उस जानिब मुँह कर के चले दश्त-ए-जुनूँ के दीवाने भी मिस्ल-ए-सबा चालाक हुए ख़ाक-ए-नशेमन जब उड़ती है दिल से धुआँ सा उठता है हादसे इस गुलज़ार में वर्ना और बहुत ग़मनाक हुए देखते देखते दुनिया बदली गुलशन क्या वीराना क्या पर्बत पर्बत नक़्श थे जिन के मिटते मिटते ख़ाक हुए जान-ए-चमन जो गुल थे 'अख़्तर' वो तो हुए मा'तूब ओ ज़लील ज़ेब-ए-गुलिस्ताँ रौनक़-ए-गुलशन कल के ख़स-ओ-ख़ाशाक हुए — Akhtar Ansari
सदा कुछ ऐसी मिरे गोश-ए-दिल में आती है कोई बिना-ए-कुहन जैसे लड़खड़ाती है रचा हुआ है फ़ज़ाओं में एक अथाह हिरास दिमाग़ शल है मगर रूह सनसनाती है मुझे यक़ीन है आँधी कोई उठी है कहीं कि लौ चराग़-ए-शबिस्ताँ की थरथराती है उमीद यास के गहरे ख़मोश जंगल में हवा-ए-शाम की मानिंद सरसराती है सवाल है ग़म-ए-हस्ती के बीत जाने का ये ज़िंदगी तो बहर-हाल बीत जाती है ख़याल-ए-उम्र-ए-गुज़िश्ता ज़रा तवक़्क़ुफ़ कर ज़मीन क़दमों के नीचे से निकली जाती है मैं अपनी आग में जल कर कभी का ख़ाक हुआ ये ज़िंदगी मुझे क्या ख़ाक में मिलाती है निशाना-बाज़ फ़लक तेरे नावकों की ख़ैर कि जिन की ज़द पे मिरे हौसलों की छाती है लचक ही जाती है शाख़ अपने आशियाँ की भी चमन में गाती हुई जब बहार आती है फ़ुग़ान-ए-दर्द लबों पर न आइयो ज़िन्हार मिरी सलीक़ा-शिआ'री पे बात आती है इधर ये गिरिया-ए-अब्र और उधर वो ख़ंदा-ए-बर्क़ मिज़ाज-ए-दहर मिरे दोस्त तंज़ियाती है रहीन-ए-रस्म-ओ-रिवायत हो जिस की बुत-शिकनी वो बुत-शिकन भी हक़ीक़त में सोमनाती है बपा है शोर-ए-क़यामत दिमाग़ में 'अख़्तर' ज़बान-ए-ख़ामा मगर ज़मज़मे लुटाती है — Akhtar Ansari
लुत्फ़ ले ले के पिए हैं क़दह-ए-ग़म क्या क्या हम ने फ़िरदौस बनाए हैं जहन्नम क्या क्या आँसुओं को भी पिया जुरआ-ए-सहबा की तरह साग़र-ओ-जाम बने दीदा-ए-पुर-नम क्या क्या हल्क़ा-ए-दाम-ए-वफ़ा उक़्दा-ए-ग़म मौज-ए-नशात ये ज़माना भी दिखाता है चम-ओ-ख़म क्या क्या लज़्ज़त-ए-हिज्र कभी इशरत-ए-दीदार कभी आरज़ू ने भी तबीअ'त को दिए दम क्या क्या किस किस अंदाज़ से खटके रग-ए-गुल के नश्तर तपिश-अफ़रोज़ हुए शोला-ओ-शबनम क्या क्या शाम-ए-वीराँ की उदासी शब-ए-तीरा का सुकूत दिल-ए-महज़ूँ को मिले हमदम ओ महरम क्या क्या हाए वो आलम-ए-बे-नाम कि जिस आलम में बीत जाते हैं दिल-ए-ज़ार पे आलिम क्या क्या इस्मत ओ रिफ़अत-ए-अंजुम से ख़याल आता है ख़ाक में रौंदी गई हुर्मत-ए-आदम क्या क्या दब गए मिन्नत-ए-मज़दूर से ऐवाँ कितने झुक गए ग़ैरत-ए-मफ़्तूह से परचम क्या किया थे मुसल्लह ग़म-ए-माशूक़ से गो हम 'अख़्तर' फिर भी दिखलाए ग़म-ए-दहर ने दम-ख़म क्या क्या — Akhtar Ansari
ये सनम रिवायत-ओ-नक़्ल के हुबल-ओ-मनात से कम नहीं तेरा फ़िक्र वाइ'ज़-ए-हक़-नवा किसी सोमनात से कम नहीं कहीं बर्क़ चमके मैं जल उठूँ कोई तारा टूटे मैं रो पड़ूँ ये दिल-ए-सितम-ज़दा हम-नशीं दिल-ए-काएनात से कम नहीं कहीं रंग-ओ-नूर-ए-जमाल है कहीं बीम-ओ-फ़िक्र-ए-मआल है कहीं शाम ग़ैरत-ए-सुब्ह है कहीं दिन भी रात से कम नहीं जिसे कहिए रक़्स-ए-शरार-ए-ग़म वो अगर हो शामिल-ए-ग़म तो फिर ग़म-ए-दिल हो या ग़म-ए-ज़िंदगी ग़म-ए-काएनात से कम नहीं ये सुरूर 'अख़्तर'-ए-दिल-ज़दा रजज़-ए-बहार-ओ-शबाब है ये बुलंद होती हुई फ़ुग़ाँ अलम-ए-हयात से कम नहीं — Akhtar Ansari
मोहब्बत करने वालों के बहार-अफ़रोज़ सीनों में रहा करती है शादाबी ख़िज़ाँ के भी महीनों में ज़िया-ए-मेहर आँखों में है तौबा मह-जबीनों के कि फ़ितरत ने भरा है हुस्न ख़ुद अपना हसीनों में हवा-ए-तुंद है गिर्दाब है पुर-शोर धारा है लिए जाते हैं ज़ौक-ए-आफ़ियत सी शय सफ़ीनों में मैं हँसता हूँ मगर ऐ दोस्त अक्सर हँसते हुए भी छुपाए होते हैं दाग़ और नासूर अपने सीनों में मैं उन में हूँ जो हो कर आस्तान-ए-दोस्त से महरूम लिए फिरते हैं सज्दों की तड़प अपनी जबीनों में मिरी ग़ज़लें पढ़ें सब अहल-ए-दिल और मस्त हो जाएँ मय-ए-जज़्बात लाया हूँ मैं लफ़्ज़ी आबगीनों में — Akhtar Ansari