Yusha Abbas 'Amr'

Yusha Abbas 'Amr'

@abbasrizvi18

Abbas Rizvi 'Amr' shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Abbas Rizvi 'Amr''s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Ghazal

अक्स जब तेरा मुझे उस में मिला तो हॅंस दिया मैं ग़ौर से देखा जो मैं ने आइना तो हॅंस दिया मैं तोहमतें सब झेलता था लैला मजनूॅं खेलता था एक पत्थर जब मेरे सर पे पड़ा तो हॅंस दिया मैं मौत मुझ तक आ रही थी नूर सा इक छा रहा था नूर के पीछे तिरा चेहरा दिखा तो हॅंस दिया मैं मेरी साॅंसों की रवानी आख़िरी मंज़िल पे पहुॅंची इंतिहा पे फिर मिली इक इब्तिदा तो हॅंस दिया मैं मैं खड़ा शमशान में ताज़ा यतीमी चख रहा था उस चिता में मैं जो लड़का सा दिखा तो हॅंस दिया में रात दिन सींचा जिसे था मैं ने अपने आँसुओं से है अजब वो जब हुआ मुझ सेे जुदा तो हॅंस दिया मैं हर तरफ़ अफ़सुरदगी थी हादसे थे बेकली थी जो न दूजा रास्ता कोई दिखा तो हॅंस दिया मैं हर सिपर को तोड़ता था मैं मुक़द्दर मोड़ता था वार से अपने ही मैं जब ख़ुद गिरा तो हॅंस दिया मैं मैं तो यूशा रो रहा था एक जमघट हॅंस रहा था हाॅं मगर जब वो भी मुझ पे हॅंस पड़ा तो हॅंस दिया मैं — Yusha Abbas 'Amr'
ख़ुश-क़िस्मत हूँ जो ऐसी तदफ़ीन मिलेगी जेलर साब अपने हाथों से वो मेरा कफ़न सियेगी जेलर साब हो पाए तो आप मुझे बस इसी जगह दफ़ना देना मुझ को है उम्मीद यहाँ इक कली खिलेगी जेलर साब अभी अभी तो उस के अब्बा इस शादी को माने थे जाने अगले ख़त में वो क्या बात लिखेगी जेलर साब फाँसी से पहले ये प्याला उस सेे वापस ले आना इस प्याले से पानी वो इक बार पियेगी जेलर साब बरसों तक क़ानून थका अब क़लम का मुँह भी टूट चुका अब भी उस पगली की ज़िद है मुझ पे मरेगी जेलर साब मेरी माँ से कह दो मुझ को मुआ'फ़ करे मिलने आए पूछो आख़िर बारी मेरे गाल छुएगी जेलर साब बूढ़े हैं माँ बाप मेरे और छत बरसों से टपकती है मेरी कट जाएगी उन की कैसे कटेगी जेलर साब सारी मिट्टी सड़ जाएगी गन्दी बदबू आएगी जहाँ जहाँ ख़ून-ए-नाहक़ की बूँद गिरेगी जेलर साब क़ैदीघर की आज हर इक दीवार गिरेगी जेलर साब अब से हम कुत्तों की ही सरकार चलेगी जेलर साब थोड़ा और सँभाले ख़ुद को कर लें अपनी आँखें बंद बहुत जुगाड़ू चाकू है कुछ देर लगेगी जेलर साब क्यूँ आख़िर इस जंगल में इन्साँ बनने की ठानी थी अब इस दार पे हम दोनों की शाम ढलेगी जेलर साब ठीक है माना आप को सीएम का ही सीधा ऑडर है अपनी सत्ता आने दें ये बात उठेगी जेलर साब सुना है मैं ने इस हफ़्ते में कुछ तो होने वाला है बावर्चीख़ाने में अचानक आग लगेगी जेलर साब इन दीवारों को मेरा हर जुर्म पता है मेरे बा'द इस कमरे से बेहद गन्दी महक उठेगी जेलर साब — Yusha Abbas 'Amr'
ग़ैब से इक नूर का टुकड़ा गिरा ये क्या हुआ इंतिहा है ये कोई या इब्तिदा ये क्या हुआ कौन सा मंज़र है जो मैं देखने से डर गया फूॅंक से मेरी बुझा मेरा दिया ये क्या हुआ शहर में तो आतिशों का रक़्स बरपा है मगर आ रही है सर्द खिड़की से हवा ये क्या हुआ नफ़सियाती ऐब है या फिर निदा-ए-ग़ैब है दे रहा है कौन रो रो कर सदा ये क्या हुआ रक़्स-ए-गिरियाॅं धुन्ध जैसी शय कोई करने लगी इक धुऑ यकदम रज़ाई से उठा ये क्या हुआ आज दो मुर्दा सितारे शौक़ में टकरा गए और भी फैली ख़लाओं में ख़ला ये क्या हुआ ये ग़ज़ल पाई गई है ख़्वाब की ता'बीर में इस ग़ज़ल को नींद में मैं ने कहा ये क्या हुआ — Yusha Abbas 'Amr'
ये दिल फिर टूटता है इत्तिफ़ाक़न मुझे तू फिर मिला है इत्तिफ़ाक़न क़सम तेरी मैं पत्थर बन चुका हूँ ये ऑंसू गिर रहा है इत्तिफ़ाक़न निगूँ रहता था जो पहलू में तेरे वो सर अब कट चुका है इत्तिफ़ाक़न जो आया बा'द तेरे उस का चेहरा तिरे चेहरे ही सा है इत्तिफ़ाक़न तुझे मुझ सेे भी बदतर मिल गया है ये मेरी बद-दुआ है इत्तिफ़ाक़न मुझे हर जानलेवा हादसे में तिरा चेहरा दिखा है इत्तिफ़ाक़न बिल-आख़िर आज उस खाई किनारे तिरा बेटा खड़ा है इत्तिफ़ाक़न पुराना था हवा से गिर पड़ा था नया पंखा लगा है इत्तिफ़ाक़न इमरजेंसी के ख़ाने में अभी तक तिरा नंबर लिखा है इत्तिफ़ाक़न था वा'दा तो न मुॅंह लगने का यूशा अचानक लब हिला है इत्तिफ़ाक़न — Yusha Abbas 'Amr'
नाम पे तेरे मुझे मारा गया ये क्या ख़ुदा ये मिला मुझ को इबादत का सिला ये क्या ख़ुदा सम्त उस की आ रहे था तीर जो मैं खा गया आख़िरश मैं तेग़ से उस की मरा ये क्या ख़ुदा इक तरफ़ कुछ गर्म सा लगता है बिस्तर आज भी जो की सोता था उधर वो तो गया ये क्या ख़ुदा एक पल को इक हॅंसी सी छूटती है और फिर बस वहीं पर हो मैं जाता चुप खड़ा ये क्या ख़ुदा मैं उसे जकड़े हुए था और वो कहती गई कर रहीं हूँ वापसी सू-ए-ख़ुदा ये क्या ख़ुदा ख़ूॅं पसीने से ख़रीदी एक गाड़ी और उधर मेरे बचपन का वो झूला जल गया ये क्या ख़ुदा अब से पहले भी तो रसमन ये इबादत की गई आज कैसे ये मिरा ऑंसू बहा ये क्या ख़ुदा मैं सरापा प्यार था ख़ुशवार था हुश्यार था मैं अचानक शा'इरी करने लगा ये क्या ख़ुदा — Yusha Abbas 'Amr'

Nazm

"इक जोगी इक टीले पर" इक जोगी इक टीले ऊपर जाने क्या क्या बकता है वस्त्र उतारे बैठा है और चाँद सितारे तकता है झिलमिल झिलमिल तारे कुछ हँसते हैं कुछ मुस्काते हैं चाँद बड़ा इतराता है और जुगनू गीत सुनाते हैं उन गीतों की परतें धीमे धीमे कर के खुलती हैं मिश्री जैसी जोगी की हर बात में आ कर घुलती हैं पेड़ भी जोगी को सुनने को हल्का सा झुक जाता है पेड़ का पत्ता पत्ता चाँद का आईना बन जाता है एक शम्अ' है जो बस जोगी को ही तकती जाती है देख के जोगी को वो कुछ बलखाती है शरमाती है कुछ परवाने शम्अ' के शरमाने से मर जाते हैं कुछ परवाने बस जोगी की बातें सुनने आते हैं नींद भी जोगी की बातों से मनमोहित हो जाती हैं धीमे धीमे चुपके चुपके जोगी में खो जाती है रात का घूँघट गिरता है सूरज का नूर सताता है जोगी आधी आँखें खोले उठता है मुरझाता है कोट पहन कर टाय पहन कर लौट के दफ़्तर जाता है — Yusha Abbas 'Amr'