ग़ैब से इक नूर का टुकड़ा गिरा ये क्या हुआ
इंतिहा है ये कोई या इब्तिदा ये क्या हुआ
कौन सा मंज़र है जो मैं देखने से डर गया
फूॅंक से मेरी बुझा मेरा दिया ये क्या हुआ
शहर में तो आतिशों का रक़्स बरपा है मगर
आ रही है सर्द खिड़की से हवा ये क्या हुआ
नफ़सियाती ऐब है या फिर निदा-ए-ग़ैब है
दे रहा है कौन रो रो कर सदा ये क्या हुआ
रक़्स-ए-गिरियाॅं धुन्ध जैसी शय कोई करने लगी
इक धुऑ यकदम रज़ाई से उठा ये क्या हुआ
आज दो मुर्दा सितारे शौक़ में टकरा गए
और भी फैली ख़लाओं में ख़ला ये क्या हुआ
ये ग़ज़ल पाई गई है ख़्वाब की ता'बीर में
इस ग़ज़ल को नींद में मैं ने कहा ये क्या हुआ
— Yusha Abbas 'Amr'















