Hafeez Merathi

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Hafeez Merathi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Hafeez Merathi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

कभी कभी हमें दुनिया हसीन लगती थी कभी कभी तिरी आँखों में प्यार देखते थे — Hafeez Merathi
इक अजनबी के हाथ में दे कर हमारा हाथ लो साथ छोड़ने लगा आख़िर ये साल भी — Hafeez Merathi
वो वक़्त का जहाज़ था करता लिहाज़ क्या मैं दोस्तों से हाथ मिलाने में रह गया — Hafeez Merathi

Ghazal

आबाद रहेंगे वीराने शादाब रहेंगी ज़ंजीरें जब तक दीवाने ज़िंदा हैं फूलेंगी फलेंगी ज़ंजीरें आज़ादी का दरवाज़ा भी ख़ुद ही खोलेंगी ज़ंजीरें टुकड़े टुकड़े हो जाएँगी जब हद से बढ़ेंगी ज़ंजीरें जब सब के लब सिल जाएँगे हाथों से क़लम छिन जाएँगे बातिल से लोहा लेने का एलान करेंगी ज़ंजीरें अंधों बहरों की नगरी में यूँँ कौन तवज्जोह करता है माहौल सुनेगा देखेगा जिस वक़्त बजेंगी ज़ंजीरें जो ज़ंजीरों से बाहर हैं आज़ाद उन्हें भी मत समझो जब हाथ कटेंगे ज़ालिम के उस वक़्त कटेंगी ज़ंजीरें ज़ंजीरें तो कट जाएँगी हाँ उन के निशाँ रह जाएँगे मेरा क्या है ज़ालिम तुझ को बदनाम करेंगी ज़ंजीरें ये दौर भी हैं सय्यादी के ये ढंग भी हैं जल्लादी के सिमटेगी सिकुड़ेंगी ज़ंजीरें फैलेंगी फलेंगी ज़ंजीरें ले दे के 'हफ़ीज़' उन सेे ही थी उम्मीद-ए-वफ़ा दीवानों को क्या होगा जब दीवानों से नाता तोड़ेंगी ज़ंजीरें — Hafeez Merathi
बड़े अदब से ग़ुरूर-ए-सितम-गराँ बोला जब इंक़लाब के लहजे में बे-ज़बाँ बोला तकोगे यूँँही हवाओं का मुँह भला कब तक ये ना-ख़ुदाओं से इक रोज़ बादबाँ बोला चमन में सब की ज़बाँ पर थी मेरी मज़लूमी मिरे ख़िलाफ़ जो बोला तो बाग़बाँ बोला यही बहुत है कि ज़िंदा तो हो मियाँ-साहब ज़माना सुन के मिरे ग़म की दास्ताँ बोला हिसार-ए-जब्र में ज़िंदा बदन जलाए गए किसी ने दम नहीं मारा मगर धुआँ बोला असर हुआ तो ये तक़रीर का कमाल नहीं मिरा ख़ुलूस मुख़ातब था मैं कहाँ बोला कहा न था कि नवाज़ेंगे हम 'हफ़ीज़' तुझे उड़ा के वो मिरे दामन की धज्जियाँ बोला — Hafeez Merathi
बे-सहारों का इंतिज़ाम करो या'नी इक और क़त्ल-ए-आम करो ख़ैर-ख़्वाहों का मशवरा ये है ठोकरें खाओ और सलाम करो दब के रहना हमें नहीं मंज़ूर ज़ालिमो जाओ अपना काम करो ख़्वाहिशें जाने किस तरफ़ ले जाएँ ख़्वाहिशों को न बे-लगाम करो मेज़बानों में हो जहाँ अन-बन ऐसी बस्ती में मत क़याम करो आप छट जाएँगे हवस वाले तुम ज़रा बे-रुख़ी को आम करो ढूँडते हो गिरों पड़ों को क्यूँँ उड़ने वालों को ज़ेर-ए-दाम करो देने वाला बड़ाई भी देगा तुम समाई का एहतिमाम करो बद-दुआ दे के चल दिया वो फ़क़ीर कह दिया था कि कोई काम करो ये हुनर भी बड़ा ज़रूरी है कितना झुक कर किसे सलाम करो सर-फिरों में अभी हरारत है इन जियालों का एहतिराम करो साँप आपस में कह रहे हैं 'हफ़ीज़' आस्तीनों का इंतिज़ाम करो — Hafeez Merathi
तमाम रात आँसुओं से ग़म उजालता रहा मैं ग़म उजाल उजाल कर ख़ुशी में ढालता रहा जवान मेरी हिम्मतें बुलंद मेरे हौसले हिसार तोड़ता रहा कमंद डालता रहा बहुत ही तल्ख़ तजरबा तुम्हारी बज़्म में हुआ हर आदमी मिरी अना के बल निकालता रहा हैं इल्तवा की गोद के पल्ले सब उस के मसअले किसी को हल नहीं किया हमेशा टालता रहा तिरे ख़िलाफ़ इस लिए मिरी ज़बाँ न खुल सकी मैं अपनी ख़ामियों पे भी निगाह डालता रहा ख़याल-ए-यार तेरी निगहदाशत इस तरह हुई दिमाग़ थक के सो गया तो दिल सँभालता रहा 'हफ़ीज़' क्या सुनाऊँ अपनी ख़्वाहिशों की दास्ताँ पिला पिला के दूध कितने साँप पालता रहा — Hafeez Merathi
गुदाज़-ए-दिल से मिला सोज़िश-ए-जिगर से मिला जो क़हक़हों में गँवाया था चश्म-ए-तर से मिला तअ'ल्लुक़ात के ऐ दिल हज़ार पहलू हैं न जाने मुझ से वो किस नुक़्ता-ए-नज़र से मिला कभी थकन का कभी फ़ासलों का रोना है सफ़र का हौसला मुझ को न हम-सफ़र से मिला मैं दूसरों के लिए बे-क़रार फिरता हूँ अजीब दर्द मुझे मेरे चारा-गर से मिला हर इंक़लाब की तारीख़ ये बताती है वो मंज़िलों पे न पाया जो रहगुज़र से मिला न मैं ने सोज़ ही पाया न इस्तक़ामत ही हजर हजर को टटोला शजर शजर से मिला 'हफ़ीज़' हो गया आख़िर अजल से हम-आग़ोश तमाम शब का सताया हुआ सहरस मिला — Hafeez Merathi
ऐ दिल ख़ुशी का ज़िक्र भी करने न दे मुझे ग़म की बुलंदियों से उतरने न दे मुझे घर ही उजड़ गया हो तो लुत्फ़-ए-क़याम क्या ऐ गर्दिश-ए-मुदाम ठहरने न दे मुझे मक़्सद ये है सुकूँ किसी सूरत न हो नसीब ऐ चारासाज़ बात भी करने न दे मुझे चेहरे पे खाल तक भी न छोड़ेंगे बद-निगाह ऐ मेरे ख़ैर-ख़्वाह सँवरने न दे मुझे है देखने की चीज़ जो बिस्मिल का रक़्स भी दुनिया ये चाहती है कि मरने न दे मुझे ये दौर संग-दिल ही नहीं तंग-दिल भी है गर बस चले तो आह भी करने न दे मुझे अब भी ये हौसला है कि कुछ काम आ सुकूँ मैं टूट तो गया हूँ बिखरने न दे मुझे — Hafeez Merathi
बज़्म-ए-तकल्लुफ़ात सजाने में रह गया मैं ज़िंदगी के नाज़ उठाने में रह गया तासीर के लिए जहाँ तहरीफ़ की गई इक झोल बस वहीं पे फ़साने में रह गया सब मुझ पे मोहर-ए-जुर्म लगाते चले गए मैं सब को अपने ज़ख़्म दिखाने में रह गया ख़ुद हादसा भी मौत पे उस की था दम-ब-ख़ुद वो दूसरों की जान बचाने में रह गया अब अहल-ए-कारवाँ पे लगाता है तोहमतें वो हम-सफ़र जो हीले बहाने में रह गया मैदान-ए-कार-ज़ार में आए वो क़ौम क्या जिस का जवान आईना-ख़ाने में रह गया वो वक़्त का जहाज़ था करता लिहाज़ क्या मैं दोस्तों से हाथ मिलाने में रह गया सुनता नहीं है मुफ़्त जहाँ बात भी कोई मैं ख़ाली हाथ ऐसे ज़माने में रह गया बाज़ार-ए-ज़िंदगी से क़ज़ा ले गई मुझे ये दौर मेरे दाम लगाने में रह गया ये भी है एक कार-ए-नुमायाँ 'हफ़ीज़' का क्या सादा-लौह कैसे ज़माने में रह गया — Hafeez Merathi